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Wednesday, March 31, 2021

सच्चा योद्धा

 मर मरकर जीने से अच्छा,

              एक बार मरकर जीना।
चाहे छप्पन इंची हो,
              या चाहे छत्तीस का सीना।।

योद्धा डरा नहीं करते हैं,
               गीदड़ के धमकाने से।         
दुश्मन नौ दो ग्यारह होते,
               योद्धा के आ जाने से।।

आत्म प्रशंसा का योद्धा तो,
             खुश होता है  सुन सुनकर।
सच्चा योद्धा वह होता है,
              रण रिपु मारे चुन चुनकर।।

सूर्य नहीं छिपा करता है,
            बादल के छा जाने पर
उसका तेज वही दिखता है,
            बादल के छँट जाने पर।।

योद्धा शिथिल नहीं पड़ता है,
            विपदाओं के आ जाने पर।
लक्ष्य भले कितना मुश्किल हो,
              दम लेता है पा जाने पर।।       

योद्धा मरा नहीं करता है,
            जीता है अपने गुमान पर।
कथा कहानी बन करके वह,
            जीवित रहता हर जुबान पर।।

राम चन्दर आज़ाद
मो.8887732665
           

Friday, March 5, 2021

जो


जो नहीं मृत्यु से डरता है।
       वह बार बार नहीं मरता है।
जो कर्म डगर पर डटा रहा,
       वह ही मंजिल तय करता है।।

जो सबको अमृत पिला दिया
       खुद पर्वत वन में भटकता है।
इतिहास गवाह है सदियों से,
        वह ही विष घूंट गटकता है।।

जो हार हारकर भी न रुका,
        वह हार से शोभित होता है।
तालियाँ गूँजती स्वागत में,
        उसका अभिनंदन होता है।।

जो कठपुतली बनकर नाचा,
       वो कभी भला क्या टिकता है?
उसका ज़मीर मर जाता है।
         कौड़ी कौड़ी में बिकता है।।

जो औरों के मन की न सुनें,
         अपने ही मन की सुनाता है।
यह बात सही सोलह आने,
         सब ही उससे कतराता है।।

जब तक आँखों में पानी है।
         तब तक ही दुनिया सुहानी है।
आँखों का पानी सूख गया,
         फिर तो  बदनाम कहानी है।।
रामचन्दर 'आज़ाद'
8890863949



        


Wednesday, January 13, 2021

सेवा धर्म के प्रहरी

 तन समर्पित मन समर्पित

कर दिया जीवन समर्पित।
बहु आयामी, भारत स्वामी
तुम सबके जिह्वा पर चर्चित।।

बाधाओं से विचलित होना।
तुमने कभी न जाना था।
तुम्हें समाज का प्रेरक बन,
सेवा का भाव जगाना था।।

दीनदुःखी के सेवक थे ,
तुम मानवता के पुजारी।
सेवा को ही धर्म बनाया,
तुम रहकर के ब्रह्मचारी।।

धर्म के ठेकेदारों ने जब ,
निम्न समझ ठुकराया।
निज वाणी के कौशल से,
तुमने सबको चौंकाया।।

शिकागो के धर्म सभा में,
जब थोड़ा अवसर पाया।
विश्व पटल पर भारत का,
तुमने परचम लहराया।।

उनके भाषण को सुन,
सबकी हुई बोलती बंद।
सारी सभा मे छा गए,
जब 'स्वामी विवेकानंद'।।



हर रोज़ नया वर्ष है

 आज नया वर्ष है।

और कल भी नया वर्ष है।
यदि मन में हर्ष है तो,
हर रोज़ नया वर्ष है।।

समय कभी रुका नहीं,
समय कभी झुका नहीं।
समय के संग झूझकर,
जिसने किया संघर्ष है।।
सच कहूँ उसके लिए,
हर रोज़ नया वर्ष है।।

दाँत किटकिटा रहे हैँ।
नाच रहे और गा रहे हैं।
सी-सी, सिहर-सिहर,
परम्परा निभा रहे हैं।
बधाइयों में छिपी हुई,
बेबसी सहर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।

कोविड की बीमारी है।
नाईट कर्फ़्यू जारी है।
प्रकृति के प्रकोप का भी,
कहर बहुत भारी है।
जान हथेली पर लिए,
सेवा कर्म में डटे,
डॉक्टर और नर्स हैं।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।

विद्यार्थी को आस है।
फोन में क्लास है।
शिक्षक भी झूझ रहा,
ज्ञान उसके पास है।
देश के भविष्य को, 
बचाना बहुत खास है।।
उन्नति के पथ पर अब
मेरा भारत वर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।


Wednesday, June 3, 2020

कोरोना का कहर

मन्दिर मस्जिद बंद हो गए,
     गिरजा गुरुद्वारे हैं सूनसान।
अल्ला, राम, रहीम सभी ,
     कोरोना के भय से परेशान।।

मंदिर मस्जिद में ताले हैं,
     मकड़ी ने बनाये जाले हैं।
पत्थर को पूजने वाले भी,
     कितने पत्थर दिलवाले हैं।।

भगवान तो पत्थर ही के थे,
    पर भक्तों पर भी असर हुआ।
विश्वास नहीं अब रहा उन्हें,
    कोरोना का ऐसा कहर हुआ।।

मस्ज़िद की हालत और बुरी,
    भय भरा हुआ सन्नाटा पसरा।
एक सूक्ष्म जीव कोरोना से,
    मुल्ला, मौलवी में है डर गहरा।।

जब धर्मयान डूबने लगे,
      असहाय भक्तजन नर-नारी।
विज्ञान यान की शरण से ही,
       बच सकती है पृथ्वी सारी।।

विद्यालय बन गए अस्पताल,
      होटल की भी आई बारी है।
निज घरों में कैद मरीज हुए,
      दहशत की खबरें जारी हैं।।
      
जाति धर्म से ऊपर उठकर,
      मानवता ने हाथ बढ़ाया है।
गुरुद्वारे का लंगर देखो,
      जीवन को बचाने आया है।।

वह धन कुबेर की सी संपत्ति,
      यदि जनहित में काम नहीं आती।
फिर तो वह संपत्ति धूल सदृश,
       बस कष्ट ही कष्ट है पहुँचाती।।
      
     

Wednesday, May 20, 2020

मजबूर मजदूर

सिर पर गठरी कंधे गैंती,
कहाँ जा रहे हो राही।
सारा शहर लॉक डाउन है
तुम पर क्या विपदा आई।।

काम काज सब बंद पड़े हैं
सभी छिपे हैं अपने घर।
औद्योगिक संस्थान बन्द हैं
कहाँ चले इतने तत्पर।।

इधर न कोई नगर शहर है
इधर न कोई गाँव गिरांव।
इतनी भीषण सी गर्मी में
कहां तुम्हारा छाँव ठिकांव।।

डोर कौन सी खींच रही
जो खिंचे जा रहे हे राही।
किस मंजिल की आकांक्षा में,
भूख प्यास भूले भाई।।

कितनी दूर अभी जाना है
हे सृजन के अधिकारी।
मेहनत तो हर अंग तुम्हारे
फिर क्यों इतनी लाचारी?

रुको, रुको कुछ तो बोलो ना।
कहाँ चले के चले जा रहे।
क्या घरवाली की चिट्ठी से 
व्यथित खिंचे के खिंचे जा रहे।।

मुझे न जाना नगर शहर
और मुझे न औद्योगिक संस्थान।
कोरोना के महासमर ने
लूट लिया है मान अभिमान।।

अपने हांथों से मैंने जिस
नगर शहर को चमकाया।
उसी नगर और शहर ने मुझ पर
 भीषण कहर है बरसाया।।

जिस दुनिया के सम्मुख मैंने
हाथ नहीं फैलाये हैं।
आज उसी दुनिया ने देखो
रक्तिम अश्रु रुलाये हैं।।

कोई शहर नहीं जी सकता
बिन मजदूर के हे भाई!
भला बताओ कैसे रहें जब
बात पेट पर है आई।।

मंजिल दूर बहुत है भाई।
और नहीं कोई पथ साधन।
फिर भी जिसने राह सुझाई
उस प्रभु का शत शत अभिवादन।।

जिससे आशा मिली निराशा
सब स्वारथ के चोर।
निकल पड़ा हूँ दृढ़ इच्छा ले
अपने गाँव की ओर।।


Tuesday, May 12, 2020

वक्त-बेवक्त

बदल गया कुछ बदल रहा है अपना हिंदुस्तान रे।
मंद पड़ गई गाँव की रौनक शहर हुआ वीरान रे।।

जगह जगह पर पहरे हैं घर मे रहने को मजबूर।
चुपके चुपके घर जाने को बेबस हो गए मजदूर।।
फिर से याद आ रहे उनको खेत और खलिहान रे।।

काम धाम सब बंद हैं ऐसे , सांप सूंघ गया है जैसे।
सूखी रोटी भी नसीब से भाग रही जिएँ अब कैसे?
जिजीविषा के वशीभूत सब तज घर किया पयान रे।।

बीमारी लेकर आई संग बेकारी, भुखमरी का जाल।
रोजी रोटी छिनी जा रही लाचारी और खस्ताहाल।।
अस्त व्यस्त की पराकाष्ठा अब हरने लगी है प्रान रे।।

भारत भ्रमण फीका पड़ गया उनके कदमों के आगे।
लक्ष्य बनाकर निकल पड़े अब मौत देख उनको भागे।।
जीवन मरण से परे व्रत मन मे लिया है उसने ठान रे।।

जिनके फौलादी बाहों ने महल बनाये बढ़ चढ़कर।
आज निराश्रित वह पैदल निकल पड़ा है अपने घर।।
ताजमहल और लालकिला भी चकित और हैरान रे।।