सिर पर गठरी कंधे गैंती,
कहाँ जा रहे हो राही।
सारा शहर लॉक डाउन है
तुम पर क्या विपदा आई।।
काम काज सब बंद पड़े हैं
सभी छिपे हैं अपने घर।
औद्योगिक संस्थान बन्द हैं
कहाँ चले इतने तत्पर।।
इधर न कोई नगर शहर है
इधर न कोई गाँव गिरांव।
इतनी भीषण सी गर्मी में
कहां तुम्हारा छाँव ठिकांव।।
डोर कौन सी खींच रही
जो खिंचे जा रहे हे राही।
किस मंजिल की आकांक्षा में,
भूख प्यास भूले भाई।।
कितनी दूर अभी जाना है
हे सृजन के अधिकारी।
मेहनत तो हर अंग तुम्हारे
फिर क्यों इतनी लाचारी?
रुको, रुको कुछ तो बोलो ना।
कहाँ चले के चले जा रहे।
क्या घरवाली की चिट्ठी से
व्यथित खिंचे के खिंचे जा रहे।।
मुझे न जाना नगर शहर
और मुझे न औद्योगिक संस्थान।
कोरोना के महासमर ने
लूट लिया है मान अभिमान।।
अपने हांथों से मैंने जिस
नगर शहर को चमकाया।
उसी नगर और शहर ने मुझ पर
भीषण कहर है बरसाया।।
जिस दुनिया के सम्मुख मैंने
हाथ नहीं फैलाये हैं।
आज उसी दुनिया ने देखो
रक्तिम अश्रु रुलाये हैं।।
कोई शहर नहीं जी सकता
बिन मजदूर के हे भाई!
भला बताओ कैसे रहें जब
बात पेट पर है आई।।
मंजिल दूर बहुत है भाई।
और नहीं कोई पथ साधन।
फिर भी जिसने राह सुझाई
उस प्रभु का शत शत अभिवादन।।
जिससे आशा मिली निराशा
सब स्वारथ के चोर।
निकल पड़ा हूँ दृढ़ इच्छा ले
अपने गाँव की ओर।।
No comments:
Post a Comment