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Thursday, June 30, 2016

दर्द अपने चाहते हो


           गीत

दर्द अपने चाहते हो यदि छिपाना |
      सबसे पहले सीखिए तुम मुस्कराना ||
   आइना जैसे था वैसे आज भी है |
      हो गया है तो ये चेहरा पुराना ||
आपने अपने को न जाना न समझा |
      बस यही कहते रहते दुश्मन ज़माना ||
दर्द आँखों में तुम्हारे दिख रहा है |
      और करते आप हँसने का बहाना ||
ज़िन्दगी तन्हाँ नहीं कट पाएगी |
       दोस्त तुमको तो पड़ेगा ही बनाना ||
चाहते ‘आजाद’ तुम गम को भगाना |
       गीत कोई सीखिए तुम गुनगुनाना ||

    कवि एवं साहित्यकार– राम चंदर ‘आजाद’

    दूरभाष- ९९८२३९५६५३

Monday, June 27, 2016

कवित्त- बरसा

       बरसा ऋतु


बादल गरज रहे मगन गगन बीच ,                  
देखि-देखि धरती के उर हुलसाई है |
काले, भूरे, श्वेत रंग सोहत है जाके अंग ,                 
चहुँ दिश शीतल पवन पुरवाई है |
कहत 'आजाद' मोर शोर वन करि रहे,                 
मानो बरसा की आहट कानन सुनाई है |
उर में उमंग लिए छवि को निरखती है ,
साजन मिलन की सुहानी ऋतु आई है ||

जल की फुहारें टिप टिप कर भूमि गिरे।
धरती वसन हरे पहन सुहाई है।
दादुर तड़ाग तट  टर्र टर्र करि रहे।
झींगुरों ने झन झन की राग अलपाई है।
कहत अज़ाद धान रोपि रहे नर नारी,
गीत गाती सबन के मन हुलसाई है।
हँसती हँसाती काम करती है मिलि मिलि।
मानो उनको धरती से प्रीति हो आई है।।




 कवि एवं साहित्यकार&राम चंदर आजाद

Sunday, April 24, 2016

कवित्त- मित्रता

            
                  कवित्त
अपनी महानता का ढोल पीटते हों काहें,
औरों की महानता की क़द्र करि लीजिये |
अधिक चालाक जनि बनहू हमारे मीत,
थोड़ी सी मिताई का लिहाज़ करि लीजिये |
कहत ‘आजाद’ मीत संग न कपट सोहै,
अपनी कुचाल को संभाल रखि लीजिये |
अपनी हिताई हल करने के फेर में तू  ,
मीत मित्रता का बलिदान जनि कीजिये ||

कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर ‘आजाद’
ज.न.वि.पचपहाड़ ,झालावाड़ (राज.)
मो. 9982395653