बरसा ऋतु
बादल गरज रहे मगन गगन बीच ,
देखि-देखि धरती के उर हुलसाई है |
काले, भूरे, श्वेत रंग सोहत है जाके अंग ,
चहुँ दिश शीतल पवन पुरवाई है |
कहत 'आजाद' मोर शोर वन करि रहे,
मानो बरसा की आहट कानन सुनाई है |
उर में उमंग लिए छवि को निरखती है ,
देखि-देखि धरती के उर हुलसाई है |
काले, भूरे, श्वेत रंग सोहत है जाके अंग ,
चहुँ दिश शीतल पवन पुरवाई है |
कहत 'आजाद' मोर शोर वन करि रहे,
मानो बरसा की आहट कानन सुनाई है |
उर में उमंग लिए छवि को निरखती है ,
साजन मिलन की सुहानी ऋतु आई है ||
जल की फुहारें टिप टिप कर भूमि गिरे।
धरती वसन हरे पहन सुहाई है।
दादुर तड़ाग तट टर्र टर्र करि रहे।
झींगुरों ने झन झन की राग अलपाई है।
कहत अज़ाद धान रोपि रहे नर नारी,
गीत गाती सबन के मन हुलसाई है।
हँसती हँसाती काम करती है मिलि मिलि।
मानो उनको धरती से प्रीति हो आई है।।
कवि एवं साहित्यकार&राम चंदर आजाद

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