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Friday, January 20, 2023
Tuesday, October 19, 2021
मेरी स्वाधीन कलम
** मेरी स्वाधीन कलम **
प्रेम, दया, करुणा, ममता-सी,
साफ, स्वच्छ जैसी शबनम।
हिय के भाव तराशे हरपल,
यह मेरी स्वाधीन कलम।।
गीतों में मधुरस भरती है,
स्वाभिमान की छवि रखती है।
औषिधि बन पीड़ा हरती है,
पर्चे पर नुस्खे लिखती है।।
कर्तव्यों की सीख सिखाती,
अधिकारों की राह दिखाती।
ज्ञान, मान की सहचरणी बन,
कोरे कागज में सब कह जाती।।
दुनिया की कोई ताकत ,
उसके सम्मुख नही टिकती है।
जब चलती स्वाधीन कलम,
फिर सच की आग उगलती है।।
व्यभिचारी, अत्याचारी को,
कारागार के मार्ग दिखाती।
जज के हाथों में शोभित हो,
सत्य पक्ष में न्याय दिलाती।।
यह मेरी स्वाधीन कलम है,
शिक्षक, छात्रों की पसंद है।
इनसे है जन्मों का नाता,
सृष्टि इन्हीं से अक्लमंद है।।
यह अपने मन की सुनती है,
नही किसी से यह डरती है।।
हो करके आज़ाद हमेशा,
नव सृजन रचना करती है।।
Wednesday, March 31, 2021
सच्चा योद्धा
मर मरकर जीने से अच्छा,
एक बार मरकर जीना।
चाहे छप्पन इंची हो,
या चाहे छत्तीस का सीना।।
योद्धा डरा नहीं करते हैं,
गीदड़ के धमकाने से।
दुश्मन नौ दो ग्यारह होते,
योद्धा के आ जाने से।।
आत्म प्रशंसा का योद्धा तो,
खुश होता है सुन सुनकर।
सच्चा योद्धा वह होता है,
रण रिपु मारे चुन चुनकर।।
सूर्य नहीं छिपा करता है,
बादल के छा जाने पर
उसका तेज वही दिखता है,
बादल के छँट जाने पर।।
योद्धा शिथिल नहीं पड़ता है,
विपदाओं के आ जाने पर।
लक्ष्य भले कितना मुश्किल हो,
दम लेता है पा जाने पर।।
योद्धा मरा नहीं करता है,
जीता है अपने गुमान पर।
कथा कहानी बन करके वह,
जीवित रहता हर जुबान पर।।
राम चन्दर आज़ाद
मो.8887732665
Friday, March 5, 2021
जो
जो नहीं मृत्यु से डरता है।
वह बार बार नहीं मरता है।
जो कर्म डगर पर डटा रहा,
वह ही मंजिल तय करता है।।
जो सबको अमृत पिला दिया
खुद पर्वत वन में भटकता है।
इतिहास गवाह है सदियों से,
वह ही विष घूंट गटकता है।।
जो हार हारकर भी न रुका,
वह हार से शोभित होता है।
तालियाँ गूँजती स्वागत में,
उसका अभिनंदन होता है।।
जो कठपुतली बनकर नाचा,
वो कभी भला क्या टिकता है?
उसका ज़मीर मर जाता है।
कौड़ी कौड़ी में बिकता है।।
जो औरों के मन की न सुनें,
अपने ही मन की सुनाता है।
यह बात सही सोलह आने,
सब ही उससे कतराता है।।
जब तक आँखों में पानी है।
तब तक ही दुनिया सुहानी है।
आँखों का पानी सूख गया,
फिर तो बदनाम कहानी है।।
रामचन्दर 'आज़ाद'
8890863949
Wednesday, January 13, 2021
सेवा धर्म के प्रहरी
तन समर्पित मन समर्पित
कर दिया जीवन समर्पित।
बहु आयामी, भारत स्वामी
तुम सबके जिह्वा पर चर्चित।।
बाधाओं से विचलित होना।
तुमने कभी न जाना था।
तुम्हें समाज का प्रेरक बन,
सेवा का भाव जगाना था।।
दीनदुःखी के सेवक थे ,
तुम मानवता के पुजारी।
सेवा को ही धर्म बनाया,
तुम रहकर के ब्रह्मचारी।।
धर्म के ठेकेदारों ने जब ,
निम्न समझ ठुकराया।
निज वाणी के कौशल से,
तुमने सबको चौंकाया।।
शिकागो के धर्म सभा में,
जब थोड़ा अवसर पाया।
विश्व पटल पर भारत का,
तुमने परचम लहराया।।
उनके भाषण को सुन,
सबकी हुई बोलती बंद।
सारी सभा मे छा गए,
जब 'स्वामी विवेकानंद'।।
हर रोज़ नया वर्ष है
आज नया वर्ष है।
और कल भी नया वर्ष है।
यदि मन में हर्ष है तो,
हर रोज़ नया वर्ष है।।
समय कभी रुका नहीं,
समय कभी झुका नहीं।
समय के संग झूझकर,
जिसने किया संघर्ष है।।
सच कहूँ उसके लिए,
हर रोज़ नया वर्ष है।।
दाँत किटकिटा रहे हैँ।
नाच रहे और गा रहे हैं।
सी-सी, सिहर-सिहर,
परम्परा निभा रहे हैं।
बधाइयों में छिपी हुई,
बेबसी सहर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।
कोविड की बीमारी है।
नाईट कर्फ़्यू जारी है।
प्रकृति के प्रकोप का भी,
कहर बहुत भारी है।
जान हथेली पर लिए,
सेवा कर्म में डटे,
डॉक्टर और नर्स हैं।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।
विद्यार्थी को आस है।
फोन में क्लास है।
शिक्षक भी झूझ रहा,
ज्ञान उसके पास है।
देश के भविष्य को,
बचाना बहुत खास है।।
उन्नति के पथ पर अब
मेरा भारत वर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।
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