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Tuesday, October 19, 2021

मेरी स्वाधीन कलम

 ** मेरी स्वाधीन कलम **

प्रेम, दया, करुणा, ममता-सी,
     साफ, स्वच्छ जैसी  शबनम।
हिय के भाव तराशे हरपल,
      यह  मेरी स्वाधीन कलम।।

गीतों में मधुरस भरती है,
       स्वाभिमान की छवि रखती है।
औषिधि बन पीड़ा हरती है,
       पर्चे पर नुस्खे लिखती है।।

कर्तव्यों की सीख सिखाती,
        अधिकारों की राह दिखाती।
ज्ञान, मान  की सहचरणी बन,
        कोरे कागज में सब कह जाती।।

दुनिया की कोई ताकत ,
       उसके सम्मुख नही टिकती है।
जब चलती स्वाधीन कलम,
        फिर सच की आग उगलती है।।

व्यभिचारी, अत्याचारी को,
          कारागार के मार्ग दिखाती।
जज के हाथों में शोभित हो,
          सत्य पक्ष में न्याय दिलाती।।

यह मेरी  स्वाधीन कलम है,
          शिक्षक, छात्रों की पसंद है।
इनसे है जन्मों का नाता,
          सृष्टि इन्हीं से अक्लमंद है।।

यह अपने मन की सुनती है,
        नही किसी से यह डरती है।।
हो करके आज़ाद हमेशा,
         नव सृजन रचना करती है।।

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