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Wednesday, January 13, 2021

सेवा धर्म के प्रहरी

 तन समर्पित मन समर्पित

कर दिया जीवन समर्पित।
बहु आयामी, भारत स्वामी
तुम सबके जिह्वा पर चर्चित।।

बाधाओं से विचलित होना।
तुमने कभी न जाना था।
तुम्हें समाज का प्रेरक बन,
सेवा का भाव जगाना था।।

दीनदुःखी के सेवक थे ,
तुम मानवता के पुजारी।
सेवा को ही धर्म बनाया,
तुम रहकर के ब्रह्मचारी।।

धर्म के ठेकेदारों ने जब ,
निम्न समझ ठुकराया।
निज वाणी के कौशल से,
तुमने सबको चौंकाया।।

शिकागो के धर्म सभा में,
जब थोड़ा अवसर पाया।
विश्व पटल पर भारत का,
तुमने परचम लहराया।।

उनके भाषण को सुन,
सबकी हुई बोलती बंद।
सारी सभा मे छा गए,
जब 'स्वामी विवेकानंद'।।



हर रोज़ नया वर्ष है

 आज नया वर्ष है।

और कल भी नया वर्ष है।
यदि मन में हर्ष है तो,
हर रोज़ नया वर्ष है।।

समय कभी रुका नहीं,
समय कभी झुका नहीं।
समय के संग झूझकर,
जिसने किया संघर्ष है।।
सच कहूँ उसके लिए,
हर रोज़ नया वर्ष है।।

दाँत किटकिटा रहे हैँ।
नाच रहे और गा रहे हैं।
सी-सी, सिहर-सिहर,
परम्परा निभा रहे हैं।
बधाइयों में छिपी हुई,
बेबसी सहर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।

कोविड की बीमारी है।
नाईट कर्फ़्यू जारी है।
प्रकृति के प्रकोप का भी,
कहर बहुत भारी है।
जान हथेली पर लिए,
सेवा कर्म में डटे,
डॉक्टर और नर्स हैं।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।

विद्यार्थी को आस है।
फोन में क्लास है।
शिक्षक भी झूझ रहा,
ज्ञान उसके पास है।
देश के भविष्य को, 
बचाना बहुत खास है।।
उन्नति के पथ पर अब
मेरा भारत वर्ष है।।
हर रोज़ नया वर्ष है।।


Wednesday, June 3, 2020

कोरोना का कहर

मन्दिर मस्जिद बंद हो गए,
     गिरजा गुरुद्वारे हैं सूनसान।
अल्ला, राम, रहीम सभी ,
     कोरोना के भय से परेशान।।

मंदिर मस्जिद में ताले हैं,
     मकड़ी ने बनाये जाले हैं।
पत्थर को पूजने वाले भी,
     कितने पत्थर दिलवाले हैं।।

भगवान तो पत्थर ही के थे,
    पर भक्तों पर भी असर हुआ।
विश्वास नहीं अब रहा उन्हें,
    कोरोना का ऐसा कहर हुआ।।

मस्ज़िद की हालत और बुरी,
    भय भरा हुआ सन्नाटा पसरा।
एक सूक्ष्म जीव कोरोना से,
    मुल्ला, मौलवी में है डर गहरा।।

जब धर्मयान डूबने लगे,
      असहाय भक्तजन नर-नारी।
विज्ञान यान की शरण से ही,
       बच सकती है पृथ्वी सारी।।

विद्यालय बन गए अस्पताल,
      होटल की भी आई बारी है।
निज घरों में कैद मरीज हुए,
      दहशत की खबरें जारी हैं।।
      
जाति धर्म से ऊपर उठकर,
      मानवता ने हाथ बढ़ाया है।
गुरुद्वारे का लंगर देखो,
      जीवन को बचाने आया है।।

वह धन कुबेर की सी संपत्ति,
      यदि जनहित में काम नहीं आती।
फिर तो वह संपत्ति धूल सदृश,
       बस कष्ट ही कष्ट है पहुँचाती।।
      
     

Wednesday, May 20, 2020

मजबूर मजदूर

सिर पर गठरी कंधे गैंती,
कहाँ जा रहे हो राही।
सारा शहर लॉक डाउन है
तुम पर क्या विपदा आई।।

काम काज सब बंद पड़े हैं
सभी छिपे हैं अपने घर।
औद्योगिक संस्थान बन्द हैं
कहाँ चले इतने तत्पर।।

इधर न कोई नगर शहर है
इधर न कोई गाँव गिरांव।
इतनी भीषण सी गर्मी में
कहां तुम्हारा छाँव ठिकांव।।

डोर कौन सी खींच रही
जो खिंचे जा रहे हे राही।
किस मंजिल की आकांक्षा में,
भूख प्यास भूले भाई।।

कितनी दूर अभी जाना है
हे सृजन के अधिकारी।
मेहनत तो हर अंग तुम्हारे
फिर क्यों इतनी लाचारी?

रुको, रुको कुछ तो बोलो ना।
कहाँ चले के चले जा रहे।
क्या घरवाली की चिट्ठी से 
व्यथित खिंचे के खिंचे जा रहे।।

मुझे न जाना नगर शहर
और मुझे न औद्योगिक संस्थान।
कोरोना के महासमर ने
लूट लिया है मान अभिमान।।

अपने हांथों से मैंने जिस
नगर शहर को चमकाया।
उसी नगर और शहर ने मुझ पर
 भीषण कहर है बरसाया।।

जिस दुनिया के सम्मुख मैंने
हाथ नहीं फैलाये हैं।
आज उसी दुनिया ने देखो
रक्तिम अश्रु रुलाये हैं।।

कोई शहर नहीं जी सकता
बिन मजदूर के हे भाई!
भला बताओ कैसे रहें जब
बात पेट पर है आई।।

मंजिल दूर बहुत है भाई।
और नहीं कोई पथ साधन।
फिर भी जिसने राह सुझाई
उस प्रभु का शत शत अभिवादन।।

जिससे आशा मिली निराशा
सब स्वारथ के चोर।
निकल पड़ा हूँ दृढ़ इच्छा ले
अपने गाँव की ओर।।


Tuesday, May 12, 2020

वक्त-बेवक्त

बदल गया कुछ बदल रहा है अपना हिंदुस्तान रे।
मंद पड़ गई गाँव की रौनक शहर हुआ वीरान रे।।

जगह जगह पर पहरे हैं घर मे रहने को मजबूर।
चुपके चुपके घर जाने को बेबस हो गए मजदूर।।
फिर से याद आ रहे उनको खेत और खलिहान रे।।

काम धाम सब बंद हैं ऐसे , सांप सूंघ गया है जैसे।
सूखी रोटी भी नसीब से भाग रही जिएँ अब कैसे?
जिजीविषा के वशीभूत सब तज घर किया पयान रे।।

बीमारी लेकर आई संग बेकारी, भुखमरी का जाल।
रोजी रोटी छिनी जा रही लाचारी और खस्ताहाल।।
अस्त व्यस्त की पराकाष्ठा अब हरने लगी है प्रान रे।।

भारत भ्रमण फीका पड़ गया उनके कदमों के आगे।
लक्ष्य बनाकर निकल पड़े अब मौत देख उनको भागे।।
जीवन मरण से परे व्रत मन मे लिया है उसने ठान रे।।

जिनके फौलादी बाहों ने महल बनाये बढ़ चढ़कर।
आज निराश्रित वह पैदल निकल पड़ा है अपने घर।।
ताजमहल और लालकिला भी चकित और हैरान रे।।

Sunday, April 12, 2020

तेरी वज़ह से

अपने घरों में दुबके हैं सब तेरी वज़ह से।
मुँह को छिपा रहे हैं सभी तेरी वज़ह से।।


किस्से तेरी शैतानियों के सबके ज़ुबाँ पर।
चेहरे पे सबके खौफ़ है बस तेरी वज़ह से।।


दूरी भी दो दिलों में इस कदर से बढ़ गई।
ओ! प्यार को तरस गए हैं तेरी वज़ह से।।


उपवन में खिले फूल पर भँवरे है नदारद।
ओ सहमे सहमे दिख रहे हैं तेरी वज़ह से।।


मोहताज़ हो  रहे हैं लोग  दाने दाने को।
मुँह का निवाला छिन रहा है तेरी वज़ह से।।


दिन में भी रात जैसे ही सन्नाटे का असर।
'आज़ाद' जो कुछ हो रहा है तेरी वज़ह से।।

Wednesday, December 25, 2019

चुपके चुपके

चुपके चुपके गाने वालो!
मंद -मंद मुस्काने वालो!
थोड़ा सा हँस गा लेने से,
जीवन सदा महक जाता है।।

कितनो को ऐसे देखा है।
आहें भर- भर के रोता है।
भला बताओ रो लेने से,
क्या कोई दुःख कम होता है।।

रोकर नयन गँवाने वालो!
औरों को भी रुलाने वालो!
गम के आंसू पी लेने से,
जीवन पुनः चहक जाता है।।

रात भले कितनी काली हो।
फिर भी उजाला आता ही है।
खोया समय भले ना आये,
फिर भी अवसर आता ही है।।

समय को लेकर रोने वालो!
समय-कदर न करने वालो!
अवसर को अपना लेने से,
बिगड़ा भाग्य चमक जाता है।।

हार-जीत है खेल जगत का,
जीता कभी कभी तो हारा।
हार जीत को एक सम जाने,
स्वागत होगा सदा तुम्हारा।।

हार पे अश्रु बहाने वालो!
जीत पे खुशी मनाने वालो!
दोनों को अपना लेने से,
जीवन पुष्प महक जाता है।।

जीवन हैअनमोल खजाना।
क्योंकर इसको व्यर्थ गँवाते।
आने वाले कल की सोचो,
बीते कल पर क्यों पछताते।।

अपनी बात सुनाने वालो!
सुबह को शाम बनाने वालों!
सुख-दुख को अपना लेने से,
फिर प्रारब्ध गमक जाता है।।