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Friday, February 17, 2017
Sunday, February 5, 2017
पाँच सौ-हज़ार
पाँच सौ-हज़ार
सौ रूपए की नोट ने बात कही मुसकाय |
हे हजार और पाँच सौ क्यों इतना इतराय ||
क्यों इतना इतराय समय की लीला न्यारी |
गयौ तुम्हारो बखत आ गयौ
मेरो बारी ||
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी समय की चोट |
उसे देख खुश हो रह्यौ सौ रूपए की नोट ||
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बड़के भैय्या आ गए दो हज़ार रंग लाल |
जिनके दर्शन के लिए जनता भई बेहाल ||
जनता भई बेहाल हाल
पूछत नहिं कोई |
सुबह से लेकर शाम रात तक लाइन होई ||
कहता है ‘आजाद’ सुबह जो पहुँचत तड़के |
वही को दर्शन देत हमारे भैय्या बड़के ||
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दो हज़ार की आस में दो सौ छोड्यौ साथ |
पास गयौ जब एटीएम खाली लौट्यौ हाथ ||
खाली लौट्यौ हाथ बड़ी मुश्किल भई भाई |
एक दिवस की सचमुच मजदूरी भी गँवाई ||
कहता है ‘आजाद’ कटेंगे कैसे कष्ट अपार |
कौन जुगुति से मिलिहैं नोट ये दो हजार ||
Saturday, February 4, 2017
आज के नेता
आज के नेता
ये चुनावी गीत है जी आप भी तो गाइए |
वोट हमें दीजिए और हमीं को जिताइए ||
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हम तुम्हारे हमदर्द व हम तुम्हारे सिरदर्द |
दर्द की दवा तो तुम हमीं से ले जाइए ||
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रूपये ले लीजिये या कम्बल वसन लीजिये |
वोट देकर ये हिसाब जल्दी से चुकाइए ||
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घर तो हम बनायेंगे ही सड़क भी बनायेंगे |
टोल टेक्स देकर मोटर खूब तुम चलाइये ||
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सतयुग, द्वापर व् त्रेता में तो हमीं रहे |
कलयुग में अब हमसे नज़र ना चुराइए ||
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सपा में भी हमीं हैं और बसपा में हमीं हैं |
भाजपा में हमीं फिर जनि सकुचाइये ||
भाजपा में हमीं फिर जनि सकुचाइये ||
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तुम तो ‘आजाद’ जी हो हमरी बिरादरी के |
कुछ तो बिरादरी का फ़र्ज़ अब निभाइए ||
Friday, January 20, 2017
Wednesday, December 14, 2016
लाइन-बे-लाइन
लाइन-बे–लाइन
लाइन में तो हम लगे वो लाइन से दूर |
फिर भी उनके पास
से नोट मिले भरपूर |
नोट मिले भरपूर गई नहीं भ्रष्टाचारी |
नोन भात को
खाय रोवै बिटिया बेचारी |
कहता है ‘आजाद’ नोट नहीं बिनु साइन में |
लक्ष्मी वा घर
चली लगे हम तो लाइन में ||
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हमको लाइन में लगा तुम घूमत परदेश |
अब तो माथा
घूमता सुनि सुनिकर उपदेश |
सुनि सुनिकर उपदेश लोग अब ऊब चुके हैं|
‘मन की बात’
के सारे रस अब सूख चुके हैं |
कहता है ‘आजाद’ उदासी घेर्यौ सबको |
राम भरोसे गयौ
लगा लाइन में हमको ||
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माला जपते जो कभी लेकर तेरा नाम |
वे भी अब चुप
दीखते देखो सुबहो शाम |
देखो सुबहो शाम बैंक की लम्बी लाइन |
ख़तम होत न
दीखती मानो सुरसा डाइन |
कहता है ‘आजाद’ पड़ा नोटों से पाला |
वे भी भये
उदास कभी जो जपते माला ||
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Tuesday, November 15, 2016
आजाद के छक्के
आजाद के छक्के
हो गई सूनी मंडियाँ,सूना
पड़ा बाज़ार |
अब कोई नहीं पूछता ,रोवै
नोट हजार |
रोवै नोट हजार ,पाँच सौ चले
न भाई |
हाय मेरे भगवान् कौन यह आफत
आई |
कहता है ‘आजाद’ रमाये रमै न
धूनी |
आम जनों की जेब हो गई ऐसी
सूनी ||
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सौ रुपये की नोट का होय रहा
सम्मान |
परदे बेपरदे भये जिनको था
अभिमान |
जिनको था अभिमान हजारों है
मेरी कीमत |
अब पूछत नहिं कोई ढेर
बैंकों में दीखत |
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी
लाग्यो चोट |
हर कोई ढूँढत फिरै सौ रुपये
की नोट ||
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सभी रुपये जा बसे अब तो
बैंक के पास |
अब कब हाथ में आइहैं हर कोई
की आस |
हर कोई की आस मिलहिं जाने
कब पैसा |
ना जाने कब होइहैं चैन पहले
के जैसा |
कहता है ‘आजाद’ नदारद हो गए
रुपये |
सचमुच में सपने सम हो गए
सभी रुपये ||
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Saturday, October 22, 2016
दीपावली के दीप
दीपावली के दीप
खुशियों से यह धरा जगमगाने लगे |
कोई कोने व
अंतरे न बाकी रहें,
प्यार आँखों से ही छलछलाने लगे ||
चाँदनी की
ज़रूरत निशा को न हो,
और धरा स्वर्ग के आशियाने से हो |
कूचे गलियों
में भी ऐसी रौनक दिखे,
गीत खुशियों के सब गुनगुनाने लगें ||
हर रकम के
सुमन सम दीये की चमक,
देख तारों का दल फुसफुसाने लगे |
देखिये वह धरा
पर कोई अपना-सा,
ऐसा कह-कह के वो मुस्कराने लगें ||
चहुँ दिशाओं में ऐसे पटाखे फुटें,
बादलों को जिन्हें देख अचरज लगे |
ये धरा पर भला
किस तरह का जशन,
कोई हमको नहीं तो बुलाने लगे ||
रोशनी में
नहायें सभी के भवन,
और परिधान धारण किये हो नए |
ये अगर-धुप की
खुशबू के साथ में,
सब निशा की गमक को बढ़ाने लगें ||
रातरानी व
चम्पा चमेली सभी,
अपने अपने महक से सुशोभित करें |
आज दीपावली के
स्वागत में मिल,
प्रेम सबके दिलों में जगाने लगें ||
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