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Friday, January 20, 2017
Wednesday, December 14, 2016
लाइन-बे-लाइन
लाइन-बे–लाइन
लाइन में तो हम लगे वो लाइन से दूर |
फिर भी उनके पास
से नोट मिले भरपूर |
नोट मिले भरपूर गई नहीं भ्रष्टाचारी |
नोन भात को
खाय रोवै बिटिया बेचारी |
कहता है ‘आजाद’ नोट नहीं बिनु साइन में |
लक्ष्मी वा घर
चली लगे हम तो लाइन में ||
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हमको लाइन में लगा तुम घूमत परदेश |
अब तो माथा
घूमता सुनि सुनिकर उपदेश |
सुनि सुनिकर उपदेश लोग अब ऊब चुके हैं|
‘मन की बात’
के सारे रस अब सूख चुके हैं |
कहता है ‘आजाद’ उदासी घेर्यौ सबको |
राम भरोसे गयौ
लगा लाइन में हमको ||
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माला जपते जो कभी लेकर तेरा नाम |
वे भी अब चुप
दीखते देखो सुबहो शाम |
देखो सुबहो शाम बैंक की लम्बी लाइन |
ख़तम होत न
दीखती मानो सुरसा डाइन |
कहता है ‘आजाद’ पड़ा नोटों से पाला |
वे भी भये
उदास कभी जो जपते माला ||
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Tuesday, November 15, 2016
आजाद के छक्के
आजाद के छक्के
हो गई सूनी मंडियाँ,सूना
पड़ा बाज़ार |
अब कोई नहीं पूछता ,रोवै
नोट हजार |
रोवै नोट हजार ,पाँच सौ चले
न भाई |
हाय मेरे भगवान् कौन यह आफत
आई |
कहता है ‘आजाद’ रमाये रमै न
धूनी |
आम जनों की जेब हो गई ऐसी
सूनी ||
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सौ रुपये की नोट का होय रहा
सम्मान |
परदे बेपरदे भये जिनको था
अभिमान |
जिनको था अभिमान हजारों है
मेरी कीमत |
अब पूछत नहिं कोई ढेर
बैंकों में दीखत |
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी
लाग्यो चोट |
हर कोई ढूँढत फिरै सौ रुपये
की नोट ||
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सभी रुपये जा बसे अब तो
बैंक के पास |
अब कब हाथ में आइहैं हर कोई
की आस |
हर कोई की आस मिलहिं जाने
कब पैसा |
ना जाने कब होइहैं चैन पहले
के जैसा |
कहता है ‘आजाद’ नदारद हो गए
रुपये |
सचमुच में सपने सम हो गए
सभी रुपये ||
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Saturday, October 22, 2016
दीपावली के दीप
दीपावली के दीप
खुशियों से यह धरा जगमगाने लगे |
कोई कोने व
अंतरे न बाकी रहें,
प्यार आँखों से ही छलछलाने लगे ||
चाँदनी की
ज़रूरत निशा को न हो,
और धरा स्वर्ग के आशियाने से हो |
कूचे गलियों
में भी ऐसी रौनक दिखे,
गीत खुशियों के सब गुनगुनाने लगें ||
हर रकम के
सुमन सम दीये की चमक,
देख तारों का दल फुसफुसाने लगे |
देखिये वह धरा
पर कोई अपना-सा,
ऐसा कह-कह के वो मुस्कराने लगें ||
चहुँ दिशाओं में ऐसे पटाखे फुटें,
बादलों को जिन्हें देख अचरज लगे |
ये धरा पर भला
किस तरह का जशन,
कोई हमको नहीं तो बुलाने लगे ||
रोशनी में
नहायें सभी के भवन,
और परिधान धारण किये हो नए |
ये अगर-धुप की
खुशबू के साथ में,
सब निशा की गमक को बढ़ाने लगें ||
रातरानी व
चम्पा चमेली सभी,
अपने अपने महक से सुशोभित करें |
आज दीपावली के
स्वागत में मिल,
प्रेम सबके दिलों में जगाने लगें ||
Thursday, October 20, 2016
हे भारत के शेरे वीर
हे भारत के शेरे वीर
जंग लग गए अस्त्र-शस्त्र में,
कब तक मौन रहोगे प्रहरी,
भारत अब हो रहा अधीर ||
जुल्मिस्तान के जुल्म सहोगे,
और रखोगे कब तक धीर |
गर्व चूर कर दो अब उसका ,
हे भारत के शेरे वीर ||
ना जाने इतराय रहा क्यूँ ,
फुदक रहा मेढक के जैसे
अब तो सबक सिखाना होगा ,
ऐसे वैसे चाहे जैसे ||
कायरता से बाज न आता ,
छिप-छिपकर वह शोर मचाता|
मगर सामने आने से वह ,
गीदड़ सम छिपता कतराता ||
उसे दिखा दो उसकी सूरत ,
ऐ भारत के सिंह सपूत |
कभी न फिर पीछे मुड देखे ,
वह कायर और जुल्मी धूर्त ||
|||||||
कवि एवं साहित्यकार- रामचंदर 'आजाद'
मो. 9414750971
Tuesday, October 18, 2016
Monday, October 17, 2016
सरहद के सैनिक
सरहद के सैनिक
कवित्त-1.
सीमा पे जवान लड़ें खोलि सीना तान लड़ें ,
देश स्वाभिमान कम होना नहीं चाहिए |
नेता जी हमारे जो जवान वीरगति पाते ,
उनके परिवार का धियान होना चाहिए ||
नारी भयी विधवा अनाथ शिशु भये सभी ,
उनकी देखरेख का विधान होना चाहिए |
कहत 'आजाद' वो तो प्राण तजे देश हित ,
नेता जी तुम्हें भी सावधान होना चाहिए ||
कवित्त-2.
उनकी कुर्बानी व्यर्थ तनिक न जाने देंगे ,
ऐसा कह के और उपहास मत कीजिए |
जो गया वो अब कभी वापस न आएगा जी ,
भाषण सुनाय परिहास मत कीजिए ||
अब हीं चुनाव का माहौल भी न आया है जी ,
इसको भुनाने का प्रयास मत कीजिए |
कहत 'आजाद' कुर्सी चाहो जो सलामत तो,
सैनिकों को हाथ खोलने का हक़ दीजिए||
कवित्त-3.
सरहद चीखती है रोज नव रूप लिए,
भारतीय शेरों को दहाड़ने तो दीजिए |
गीदड़ों की धमकी तो सुनि रहे रोज रोज ,
सिंह शावकों को अब हुंकारने तो दीजिए ||
शत्रुओं की क्या मजाल जब संग महाकाल ,
हिमिगिरि अगनि दहकने तो दीजिए |
कहत 'आजाद' मन उठ्यो विकराल ज्वाल ,
नेता जी उसे ज़रा भभकने तो दीजिए ||
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