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Wednesday, December 14, 2016

लाइन-बे-लाइन

       लाइन-बे–लाइन
लाइन में तो हम लगे वो लाइन से दूर |
फिर भी उनके पास से नोट मिले भरपूर |
नोट मिले  भरपूर गई  नहीं भ्रष्टाचारी |
नोन भात को खाय रोवै बिटिया बेचारी |
कहता है ‘आजाद’ नोट नहीं बिनु साइन में |
लक्ष्मी वा घर चली लगे हम तो लाइन में ||
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हमको लाइन में लगा तुम घूमत परदेश |
अब तो माथा घूमता सुनि सुनिकर उपदेश |
सुनि सुनिकर उपदेश लोग अब ऊब चुके हैं|
‘मन की बात’ के सारे रस अब सूख चुके हैं |
कहता है ‘आजाद’ उदासी घेर्यौ  सबको |
राम भरोसे गयौ लगा लाइन में हमको ||
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माला जपते जो कभी लेकर तेरा नाम |
वे भी अब चुप दीखते देखो सुबहो शाम |
देखो सुबहो शाम बैंक की लम्बी लाइन |
ख़तम होत न दीखती मानो सुरसा डाइन |
कहता है ‘आजाद’ पड़ा नोटों से पाला |
वे भी भये उदास कभी जो जपते माला ||
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Tuesday, November 15, 2016

आजाद के छक्के


     आजाद के छक्के

हो गई सूनी मंडियाँ,सूना पड़ा बाज़ार |

अब कोई नहीं पूछता ,रोवै नोट हजार |

रोवै नोट हजार ,पाँच सौ चले न भाई |

हाय मेरे भगवान् कौन यह आफत आई |

कहता है ‘आजाद’ रमाये रमै न धूनी |

आम जनों की जेब हो गई ऐसी सूनी ||
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सौ रुपये की नोट का होय रहा सम्मान |
परदे बेपरदे भये जिनको था अभिमान |
जिनको था अभिमान हजारों है मेरी कीमत |
अब पूछत नहिं कोई ढेर बैंकों में दीखत |
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी लाग्यो चोट |
हर कोई ढूँढत फिरै सौ रुपये की नोट ||
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सभी रुपये जा बसे अब तो बैंक के पास |
अब कब हाथ में आइहैं हर कोई की आस |
हर कोई की आस मिलहिं जाने कब पैसा |
ना जाने कब होइहैं चैन पहले के जैसा |
कहता है ‘आजाद’ नदारद हो गए रुपये |
सचमुच में सपने सम हो गए सभी रुपये ||
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Saturday, October 22, 2016

दीपावली के दीप

   दीपावली के दीप
Image result for diwali deepak imageदीप ऐसे जलाएं दिवाली में हम,
खुशियों से यह धरा जगमगाने लगे |
कोई कोने व अंतरे न बाकी रहें,
प्यार आँखों से ही छलछलाने लगे ||

चाँदनी की ज़रूरत निशा को न हो,
और धरा स्वर्ग के आशियाने से हो |
कूचे गलियों में भी ऐसी रौनक दिखे,
गीत खुशियों के सब गुनगुनाने लगें ||

हर रकम के सुमन सम दीये की चमक,
देख तारों का दल फुसफुसाने लगे |
देखिये वह धरा पर कोई अपना-सा,
ऐसा कह-कह के वो मुस्कराने लगें ||

चहुँ दिशाओं  में ऐसे पटाखे फुटें,
बादलों को जिन्हें देख अचरज लगे |
ये धरा पर भला किस तरह का जशन,
कोई हमको नहीं तो बुलाने लगे ||

रोशनी में नहायें सभी के भवन,
और परिधान धारण किये हो नए |
ये अगर-धुप की खुशबू के साथ में,
सब निशा की गमक को बढ़ाने लगें ||

रातरानी व चम्पा चमेली सभी,
अपने अपने महक से सुशोभित करें |
आज दीपावली के स्वागत में मिल,

प्रेम सबके दिलों में जगाने लगें ||

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Thursday, October 20, 2016

हे भारत के शेरे वीर


हे भारत के शेरे वीर


जंग लग गए अस्त्र-शस्त्र में,
         मंद पड़ गयी क्या शमसीर |
कब तक मौन रहोगे प्रहरी,
         भारत अब हो रहा अधीर ||

जुल्मिस्तान के जुल्म सहोगे,
और रखोगे कब तक धीर |
गर्व चूर कर दो अब उसका ,
हे भारत के शेरे वीर ||

ना जाने इतराय रहा क्यूँ ,
फुदक रहा मेढक के जैसे
अब तो सबक सिखाना होगा ,
ऐसे वैसे चाहे जैसे ||

कायरता से बाज न आता ,
छिप-छिपकर वह शोर मचाता|
मगर सामने आने से वह ,
गीदड़ सम छिपता कतराता ||

उसे दिखा दो उसकी सूरत ,
ऐ भारत के सिंह सपूत |
कभी न फिर पीछे मुड देखे ,
वह कायर और जुल्मी धूर्त ||
         |||||||

कवि एवं साहित्यकार- रामचंदर 'आजाद'
मो. 9414750971

Monday, October 17, 2016

सरहद के सैनिक

                                        
                  सरहद के सैनिक 
                      कवित्त-1.
सीमा पे जवान लड़ें खोलि सीना तान लड़ें ,
              देश स्वाभिमान कम होना नहीं चाहिए |
नेता जी हमारे जो जवान वीरगति पाते ,
             उनके परिवार का धियान होना चाहिए ||

नारी भयी विधवा अनाथ शिशु भये सभी ,
              उनकी देखरेख का विधान होना चाहिए |
कहत 'आजाद' वो तो प्राण तजे देश हित ,
             नेता जी तुम्हें भी सावधान होना चाहिए ||

                       कवित्त-2.

उनकी कुर्बानी व्यर्थ तनिक न जाने देंगे ,
                 ऐसा कह के और उपहास मत कीजिए |
जो गया वो अब कभी वापस न आएगा जी ,
                  भाषण सुनाय परिहास मत कीजिए ||

अब हीं चुनाव का माहौल भी न आया है जी ,
                  इसको भुनाने का प्रयास मत कीजिए |
कहत 'आजाद' कुर्सी चाहो जो सलामत तो,
                 सैनिकों को हाथ खोलने का हक़ दीजिए||

                         कवित्त-3.

सरहद चीखती है रोज नव रूप लिए,
                    भारतीय शेरों को दहाड़ने तो दीजिए |
गीदड़ों की धमकी तो सुनि रहे रोज रोज ,
                   सिंह शावकों को अब हुंकारने  तो दीजिए ||

शत्रुओं की क्या मजाल जब संग महाकाल ,
                  हिमिगिरि अगनि दहकने तो दीजिए |
कहत 'आजाद' मन उठ्यो विकराल ज्वाल ,
                  नेता जी उसे ज़रा भभकने तो दीजिए ||





Monday, September 5, 2016

मैं शिक्षक मोको पढनो भावै |




मैं शिक्षक मोको पढनो भावै |
पुस्तक ,कापी संगी साथी , लिखि-लिखि कलम  बतावै |
ज्ञान मेरो है पूंजी संपत्ति, खर्चहिं से बढ़ि जावै |
बालक संग बालक बनना  तो मेरे मन को भावै |
जाति-पाँति और भेदभाव मेरो मन को नाहिं सुहावै |

अपने ज्ञान दीप के बल पर, काम  करब मोहिं भावै|
बाल मनन में व्याप्त अँधेरा ,फिर घर नहिं कर पावै |
कुम्भकार सम मोहिं 'आजाद' भी रचना करन सुहावै ||


   कवि एवं साहित्यकार &रामचंदर आजाद
   मो- 9414750971