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Saturday, April 8, 2017

Thursday, March 2, 2017

चुनावी समर

चुनावी समर
यह चुनाव का महासमर है|
रैली, भाषण से व्यथित शहर है |
गाँव-गाँव में गली-गली में ,
रिश्तों में घुल रहा जहर है ||

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छोटका नेता , बड़का नेता ,
खादी कुरता वाला नेता |
सड़क छाप नुक्कड़ का नेता,
सबका अपना अलग असर है ||

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दलबदलू की कमी नहीं है |
जीत की धमकी थमी नहीं है |
जनमत को हथियाने खातिर ,
हर हथकण्डे आठों पहर है ||

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वादों की बौछारें करते,
नई सियासत नित-नित रचते ,
धर्म,जाति ,सम्प्रदायवाद का ,
जनमानस में घुला जहर है ||

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आरोपों ,प्रत्यारोपों की लम्बी फाइल ,
मानो दाग रहें हों जैसे कोई मिसाइल|
कल तक जिस पर जहर उगलते ,
आज उसी से मिली नजर है ||

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शमशानों, कब्रिस्तोनों पर भी चर्चा है |
कहते मैंने सबसे अधिक किया खर्चा है |
शायद मुर्दों से भी कुछ मत मिल ही जाए ,
इस आशा से शमशानों पर गड़ी नजर है ||

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जुमलों की बौछार देखिये ,
प्रतिनिधि भारत सरकार देखिये |
कोई मदारी जैसे आया खेल दिखाने ,
जिसे देख जनता में भी नव जोश लहर है ||

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नेता तो हैं चोर-चोर मौसेरे भाई ,
फिर भी इसमें से चुनना है मेरे भाई |
देश राष्ट्र हित इनको लेकर मंथन करिए ,
फिर निर्णय लें यह चुनाव का शुभ अवसर है ||
कवि एवम् साहित्यकार -राम चन्दर आजाद


Tuesday, February 21, 2017

नेता और अभिनेता


नेता और अभिनेता

नेता अभिनेता बने ,मंचन करते रोज
        आज यहाँ तो कल वहां ,नाटक रचते रोज |
नाटक रचते रोज ,रोज की माया शातिर ,
        जनता को गुमराह करें बस वोट के खातिर |
कहता है ‘आजाद’ लोभ लालच भी देता ,
        हो  गया है  बेशर्म  आज  नेता अभिनेता ||

नहिं विकास नहिं काज कुछ पंचवर्ष का खेल ,
        इस दल से उस दल चले कर लेते हैं मेल |
कर लेते हैं मेल मात्र कुर्सी के खातिर ,
        जनता को बहकाते कह उस दल को शातिर |
कहता है ‘आजाद’ स्वार्थ के ये सरताज ,
        कुर्सी आगे दीखता नहिं विकास नहिं काज ||

किसको जनता वोट दे यह है कठिन सवाल ,
        खड़गसिंह सम है कोई तो कोई अंगुलिमाल |
कोई अंगुलिमाल बनी राह लेत है रोक ,
        कब कोई बुध आइहैं ,उनको सके जो रोक |
कहता है ‘अजाद’देश की फिकर हो जिसको ,
        चुन ले नेता भला आज यह जनता किसको ?



Friday, February 17, 2017

मौसमी बीमारी


          मौसमी बीमारी 

खादी कुरता, गाँधी टोपी ये मौसमी बीमारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


जनता से नहीं तो किससे कहूँ मन की बातें |

वोट उन्हीं के पास है सो घूमूँगा मैं दिन-रातें |

अब तो क्षेत्र में जाऊँगा क्योंकि चुनाव की बारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


नए नए वादे फिर से और नयी लुभावन सौगातें |

उनके चेहरे पहले पढूँगा और सुनूँगा उनकी बातें |

हे मतदाता राष्ट्रविधाता यह सेवक आभारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


दल बदल दिया है हमने आप के खातिर ही |

तुम भी बदलो है सही वक्त अपने खातिर ही |

हे ग्रामदेवता ,जीवनपालक विनती यही हमारी है ||

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


बहकावे में आकर भूल न जाना मुझको |

मुझ-सा नेता नहीं मिलेगा कभी भी तुमको |

अगर जीत जाता हूँ तो समझो जीत तुम्हारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


तुम भारत के भाग्य विधाता वोट तुम्हारे पास |

मुझे नहीं तो किसे चुनोगे मैं ही हूँ तो ख़ास |

भवन बनेगा सड़क बनेगा बिजली की तैयारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


सुनो सुनो हे भाई बहनों जरा ध्यान से |

कुछ नेता बातें करते हैं बड़े शान से |

हाथ उठाकर भाषण देना उनकी एक बीमारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


                       


Sunday, February 5, 2017

पाँच सौ-हज़ार

         पाँच सौ-हज़ार

सौ रूपए की नोट ने बात कही मुसकाय |
हे हजार और पाँच सौ क्यों इतना इतराय ||
क्यों इतना इतराय समय की लीला न्यारी |
गयौ  तुम्हारो  बखत आ गयौ  मेरो बारी ||
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी समय की चोट |
उसे देख खुश हो रह्यौ सौ रूपए की नोट ||
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बड़के भैय्या आ गए दो हज़ार रंग लाल |
जिनके दर्शन के लिए जनता भई बेहाल ||
जनता भई  बेहाल हाल पूछत नहिं कोई |
सुबह से लेकर शाम रात तक लाइन होई ||
कहता है ‘आजाद’ सुबह जो पहुँचत तड़के |
वही को  दर्शन  देत हमारे  भैय्या बड़के ||
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दो हज़ार की आस में दो सौ छोड्यौ साथ |
पास गयौ जब एटीएम खाली लौट्यौ हाथ ||
खाली लौट्यौ हाथ बड़ी मुश्किल भई भाई |
एक दिवस की सचमुच मजदूरी भी गँवाई ||
कहता है ‘आजाद’ कटेंगे कैसे कष्ट अपार |

कौन जुगुति से मिलिहैं नोट ये दो हजार ||





Saturday, February 4, 2017

आज के नेता

      
       आज के नेता

ये चुनावी गीत है जी आप भी तो गाइए |
वोट हमें दीजिए और हमीं को जिताइए ||
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हम तुम्हारे हमदर्द व हम तुम्हारे सिरदर्द |
दर्द की दवा तो तुम  हमीं से ले जाइए ||
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रूपये ले लीजिये या कम्बल वसन लीजिये |
वोट देकर ये हिसाब जल्दी  से चुकाइए  ||
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घर तो हम बनायेंगे ही सड़क भी बनायेंगे |
टोल टेक्स देकर मोटर खूब तुम चलाइये ||
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सतयुग, द्वापर व् त्रेता में तो हमीं रहे |
कलयुग में अब हमसे नज़र ना चुराइए ||
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सपा में भी हमीं हैं और बसपा में हमीं हैं |
  भाजपा में  हमीं  फिर जनि  सकुचाइये ||
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तुम तो ‘आजाद’ जी हो हमरी बिरादरी के |
कुछ तो बिरादरी का फ़र्ज़ अब निभाइए ||