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Wednesday, December 25, 2019

चुपके चुपके

चुपके चुपके गाने वालो!
मंद -मंद मुस्काने वालो!
थोड़ा सा हँस गा लेने से,
जीवन सदा महक जाता है।।

कितनो को ऐसे देखा है।
आहें भर- भर के रोता है।
भला बताओ रो लेने से,
क्या कोई दुःख कम होता है।।

रोकर नयन गँवाने वालो!
औरों को भी रुलाने वालो!
गम के आंसू पी लेने से,
जीवन पुनः चहक जाता है।।

रात भले कितनी काली हो।
फिर भी उजाला आता ही है।
खोया समय भले ना आये,
फिर भी अवसर आता ही है।।

समय को लेकर रोने वालो!
समय-कदर न करने वालो!
अवसर को अपना लेने से,
बिगड़ा भाग्य चमक जाता है।।

हार-जीत है खेल जगत का,
जीता कभी कभी तो हारा।
हार जीत को एक सम जाने,
स्वागत होगा सदा तुम्हारा।।

हार पे अश्रु बहाने वालो!
जीत पे खुशी मनाने वालो!
दोनों को अपना लेने से,
जीवन पुष्प महक जाता है।।

जीवन हैअनमोल खजाना।
क्योंकर इसको व्यर्थ गँवाते।
आने वाले कल की सोचो,
बीते कल पर क्यों पछताते।।

अपनी बात सुनाने वालो!
सुबह को शाम बनाने वालों!
सुख-दुख को अपना लेने से,
फिर प्रारब्ध गमक जाता है।।



Wednesday, November 27, 2019

जीवन मे उड़ान

जिंदगी की उड़ान छोटी है या बड़ी।
महत्त्वपूर्ण यह नहीं है
पर महत्त्वपूर्ण यह है कि
वह एक उड़ान है।
जो उड़ान भरने वाले की
एक पहचान है।।
जब तक ये जहान है।
शरीर में जान है तब तक ही
जीवन मे उड़ान है।
जान गई, पहचान गई।
आदमी की उड़ान गई।
जितनी ऊँची होगी उड़ान ।
उतना ही वह होगा महान ।
जितने ऊँचे सपने
उतनी ऊँची उड़ान
कर्मठता की यही सही पहचान
लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए
उड़ान की विशेष भूमिका
जैसा लक्ष्य वैसी उड़ान।
बिना लक्ष्य के उड़ान नहीं
और बिना उड़ान के लक्ष्य..... ..।
सपनों की उड़ान कभी भी
बौनी नहीं होनी चाहिए।
लम्बी उड़ान ही हमारी
पहचान होनी चाहिए।
इसी के बल पर सामाजिक प्रतिष्ठा
को स्थान मिलता है
इसलिए- कुछ भी हो
बिना उड़ान के जीवन निरर्थक है
चाहे वह ऊँची हो
अथवा बौनी............।

Tuesday, November 26, 2019

ज़िन्दगी खेल नहीं

ज़िन्दगी खेल तो है नहीं,
खेल क्यों तुम बनाते इसे।
ये तो इक प्यार का गीत है,
क्यों इसे गुनगुनाते नहीं।।

कोई कहता ये एहसास है,
दो दिलों की मधुर प्यास है।
फिर हक़ीक़त से तुम भागते,
प्यास क्यों तुम बुझाते नहीं।।

एक दरिया सा है जिंदगी,
जिसमें अनमोल खुशियाँ भरी,
ज़िन्दगी ऐसा दरिया है तो,
फिर क्यों उसमें नहाते नहीं।।

ज़िन्दगी की है यदि रीति ये
हार के बाद ही जीत है।
फिर तो डर है ये किस बात की,
क्यों हार पर मुस्कराते नही।।

ज़िन्दगी रंजोगम का सफ़र,
कंटकों से भरी इक डगर।
बात सच है अगर आपकी,
कांटों को क्यों हटाते नहीं।।

ज़िन्दगी एक पुस्तक है जो,
जिसमें रंगीन पन्ने जड़े।
घोलकर कुछ सुनहरे से रंग,
क्यों तुम इसको सजाते नहीं।।

ज़िन्दगी एक ऐसा दीया,
ज्ञान का जो उजाला किया।
बनके तुम तेल बाती इसे,
प्यार से क्यों जलाते नहीं।।


राजनीति

राजनीति बन गई है, जोड़-तोड़ का खेल।
जिससे होती दुश्मनी, उसी से करते मेल।।
उसी से करते मेल, तोड़ देते गठबंधन।
अपने स्वारथ हित करते रहते हैं मंचन।।
कहता है 'आज़ाद' दई ये ग़ज़ब की नीति।
तोड़-फोड़ का खेल बन गई है राजनीति।।

जिससे की थी दोस्ती, वह हो गया हैरान।
सब पे पानी फेर दी अब क्या करूँ निदान।।
अब क्या करूँ निदान न कुछ भेजे में आता।
नज़र न सके मिलाय वही है आँख दिखाता।।
कहता है आज़ाद, भिड़ गए टांके उससे।
भाड़ में जाये वो, दोस्ती की थी जिससे।।

एक कुरसी के वास्ते, लगी आबरू दाँव।
कुछ भी अब हो जाय पर, नहीं हटेंगे पाँव।।
नहीं हटेंगे पाँव, सियासत कुछ भी कर लो।
करो खरीद-फरोख्त,जो मनआये वो कर लो।।
कहता है आज़ाद, नज़र में गड़ गई कुरसी ।
ग्राहक दिखत तमाम ,मगर है एक ही कुरसी।।

Wednesday, October 30, 2019

गिरता लोक तंत्र

जातिवाद और धर्मवाद से जनता हुई बेहाल रे।।
नेताओं के हर वादे कर देते हैं खुशहाल रे।।
सदा एकता खंडित होती जाति और संप्रदाय से।
वोट में कोई भेद नहीं सब लेने को तैयार रे ।
बाकी धर्म जाति से मंडित एक बड़ा व्यापार है।
तुम मेरे हो ये है पराया अलग अलग व्यवहार है।
जिसकी जितनी ऊँची कुर्सी उतना ही वो महान है।
एक देश में एक नहीं राजाओं के भरमार है।
संविधान को ताक पे रखकर कहते राज हमार है।
बाबाओं की अलग विरासत उनके अपने ठाट हैं।
रास रचाते कान्हा बनकर मजनू जाए भाड़ में।
देश सुधारक खुद करता है जनता संग खिलवाड़ रे।

कवि एवम् साहित्यकार -रामचन्दर आज़ाद
मोबाइल-8887732665

Friday, October 18, 2019

आखिर क्यों ?

आखिर -
राम ने जल समाधि क्यों ली थी?
क्या उनसे भी कोई अपराध हो गया था?
या फिर कोई प्रायश्चित ?
यह प्रश्न आज भी यथावत है
कई सहस्र सदियों के बाद भी।

इसके पीछे -
कहीं शंबुक ऋषि का वध तो नहीं
मन को आंदोलित कर रहा था
कहीं बालि का वध तो नहीं
आड़े आ रहा था
कहीं रावण के खिलाफ विभीषण 
का प्रयोग तो नहीं
कहीं अविश्वास प्रकट करती
सीता की अग्नि परीक्षा तो नहीं
कहीं गर्भवती सीता को असहाय
वन भेजने की राजाज्ञा तो नहीं।

आखिर -
राम तो एक प्रतापी राजा थे।
पूरा राज समाज उनके साथ था।
भरत ने तो अयोध्या का राज भी 
उन्हें समर्पित कर दिया था।
सभी भाई उनकी सेवा में तत्पर थे।

जल में डूब मरना कायरता का
द्योतक होता है।
राम तो कायर भी नहीं थे।
फिर उन्होंने जल समाधि क्यों ली?
आज भी यह प्रश्न मन को 
बार बार सोचने को विवश
करता है।




Thursday, October 17, 2019

वह जानती थी कि ....

वह जानती थी कि मैं एक स्त्री हूं।
वही जो पुरषों की दासी है।
सीता के मन में ऐसे 
विचार का आना सहज था।
उसे अनुभव हो चुका था।

उसे याद थे वे पल जब वह
किसी की पत्नी बनी थी।
मातृत्व व पितृत्व की खुशियों
पर लग चुके पूर्ण विराम की
अब तो वह किसी की अर्धांगिनी थी।

वही अर्धांगिनी जिसे पति जब चाहे
अलग कर दे, अपने से परे कर दे।
राम ने भी तो यही किया था
उसके साथ, जिस पर उसे अपने से
अधिक विश्वास था और होना भी चाहिए
क्योंकि वह जो अर्धांगिनी थी।

लेकिन यह क्या कुछ असामाजिक तत्वों
के फेर में उसे उसके अर्धांग द्वारा
सुना दिया गया अटल सत्य पुरूषीय 
फ़रमान वन गमन का।
अब भी उसे विश्वास था मैं जब
उनके वन गमन के समय साथ थी।
तो वे भी अवश्य रहेंगे।

लेकिन यह क्या इस दशा में 
जब मै मां बनने वाली हूं असहाय 
छोड़ दी गयी किसके भरोसे
क्या यही पतिधर्म होता है?
सीता अवाक थी अश्रुधाराएं ही बस
अब उसके साथ थीं।

पुरुष इतना कठोर होता है
आज के हिसाब से तो स्त्री आत्महत्या 
कर लेती, लेकिन सीता ऐसा नहीं करेगी
प्रतिकार लेगी, कभी भी उनका स्पर्श
नहीं करेगी न करने देगी।

आज की सीता तो जनक के 
घर चली जाती, उनको आपबीती 
सुनाती, लेकिन उस सीता का 
संबल कौन बनता, आखिर वो भी
तो राजा ही थे, वे उसे दान कर चुके थे
उस पर केवल और केवल बस राम
का अधिकार था।

शायद यही सोच वह मिथिला नरेश
के पास नहीं गयी होगी।
अब उसे रावण का अट्टहास नहीं
राम की मधुर मुस्कान व्यथित 
कर रही थी ।
एक गलत होकर भी सही तथा
एक सही होकर भी गलत लग रहा था।

लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारूंगी
पुरुषत्व को एक सत्य स्त्रीत्व के
सम्मुख झुकना होगा।
चाहे वो राम हो या रावण।
उसने संतोष की सांस ली
लक्ष्य अब उसके सामने था।

उसने यही नहीं अपने पुत्रों को 
कभी भी राम के बारे में यह नहीं
बताया कि राम ही उनके पिता हैं
कदाचित सीता को कहीं अपने पुत्रों से
भी दूर न हो जाना पड़े।

उसने -
अपने पुत्रों के माध्यम से पराजित 
कर दिया राम की सेना को, स्वयं
राम को भी आना पड़ा
उन बालको के शौर्य को सुनकर।
प्रतिकार की भावना मन में लिए हुए।

परिचय जानकर जब 
राम ने फिर से सीता को
अपनाना चाहा, सीता ने सोचा -
अब वह फिर से रामदासी नहीं बनेगी
परंतु
एक राजा कुछ भी कर सकता है
स्त्री तो अबला होती ही है।
अतः कोई विकल्प न
देखकर  वह धरती में समा गई। 
राम देखते रह गए क्योंकि पुरुषोत्तम
का पौरुष हार चुका था।