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Monday, September 17, 2018

प्रकृति का संतुलन

प्रकृति का संतुलन

भगवान करे कि
केरल जैसी बाढ़ सब जगह आए ।
जिससे हर मानव को
मानवता की समझ आ जाए।।
नहीं दिखे कोई हिन्दू, मुस्लिम
ना ही सिक्ख , ईसाई।
जाति, धर्म से ऊपर उठकर
सब लगे जैसे भाई भाई।।
मंदिर में नमाज अदा हुई
मस्ज़िद में बंटा लंगर।
हाथ बढ़ा गिरजा, गुरुद्वारे 
सेवा में थे तत्पर।।
साथ लगी थी सबकी पंगत
संग संग खाते बतियाते।
भेदभाव की ढह गई दीवारें
ढाढस इक दूजे को दिलाते।।
ऊंच नीच सब एक समान।
ढह गए बड़े बड़े अरमान।।
ऊंच नीच सब गिरे मकान।
नष्ट भए सबके अभिमान।।
प्रकृति की लीला अद्भुत है।
वह संतुलन बना लेती है ।
मानव के अतिक्रमण का वह
सदा हिसाब लगा लेती है।।
प्रकृति का दोहन मत करिए।
कदर कीजिए मेरे भाई।
जाति धर्म से ऊपर उठकर


मानवता हित करो लड़ाई।।
कवि- रामचंदर आज़ाद

Saturday, September 15, 2018

जीवन इक यात्रा है

जीवन इक यात्रा है।  बस चलते ही जाना है।।
जो भी आज यहां पर हैं उन्हें कल कहीं जाना है।।

कुछ सपने टूटेंगे, कुछ रिश्ते टूटेंगे।
कुछ हमसे रूठेंगे, कुछ से हम रूठेंगे।।
कुछ सपने रिश्तों को संग में लिए जाना है।।

जीवन में आशा संग, थोड़ी सी निराशा है।
आशा  व  निराशा ही जीवन परिभाषा है।।
आशा व निराशा को कुछ रंग से सजाना है।।

जीवन की यात्रा में जब कोई नया आए।
तब नए पुराने में मन उलझ के रह जाए।।
फिर  नए पुरानों में इक रिश्ता बनाना है।।

 कवि एवम् साहित्यकार- रमचंदर आज़ाद

ओ मेरे मन

ओ!मेरे मन । ओ,! मेरे मन ।
मेरे संग संग चलाकर । कभी तू।।.......
दूर निकल जाता जब मुझसे मै घबरा जाता हूं।
सच कहता हूं तेरे बिना नहीं चैन से रह पाता हूं।।
याद सताए लौट के आजा  भुला दे अब अनबन ।।.....
सचमुच  तेरे जिद के  आगे मै बेबस हो जाता हूं।
लाख चाहकर भी मैं तुझे कुछ कह नहीं पाता हूं।।
छोड़ दे जिद अब पास में आजा मैं हो रहा अनमन।।.....
भले भुला दे मुझको पर मैं तुझको भूल नहीं पाता हूं। 
तेरी  छवि  अंतरतर में  लिए रात  को सो  जाता हूं।।
भोर भए पर तुम्हे  खोजता कर कर लाख जतन।।.....
हे मन ! मेरे बावले इतना क्यों मुझको तड़पाता है।
तू आज़ाद बनकर घूमे मुझे तनिक नहीं भाता है।।
आ मेरे संग कुछ बातें कर ले बिता ले कुछ कुछ छन।।......
कवि-राम चन्दर आज़ाद

Wednesday, March 7, 2018

महिला


               महिला जागो
मना  रही  महिला दिवस ,
                 दुनिया   देखो आज।
शोषण, अत्याचार से गुंजित,
                 महिला की  आवाज़।।
संविधान ने दे रखे ,
            उन्हें कई अधिकार।
फिर भी वे वंचित अभी,
            जिसकीं वे हक़दार।।
अब भी पुरुष इशारे पर,
             वे सदा नाचती रहती हैं।
जैसा पुरुष चाहता है,
             वे मजबूरन करती हैं।।
अब भी पुरुष परमेश्वर है,
             महिला बस अनुगामी है।
उसकी आशाएँ पदमर्दित,
             गई न उसकी गुलामी है।।
उसे जागना होगा और
              जगाना होगा औरों को।
महिला दिवस सार्थक होगा,
               पा लें अपने अधिकारों को।।

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की,
          हार्दिक शुभकामनाओं
                     के साथ-----------
कवि एवं साहित्यकार- राम चन्दर "आज़ाद"
                              ज.न.वि.लदूना,मंदसौर (म.प्र.)

 

Monday, November 13, 2017

बात पते की

   

स्वाभिमान अभिमान द्वै मनहिं बसेरो लेत |                             

इक गिरने नहीं देत है इक उठने नहीं देत || 

अपनी इच्छा से नहीं मरघट कोई जात |                             

मुर्दे को भी बाँधकर देखो जग लै  जात || 

कबिरा पी एच डी  नहीं मीरा एम फिल नाहिं |                           

 पर अज़ाद जो कहि गए भूल सकत जग नाहिं || 
                                                  



                                                  

Tuesday, July 4, 2017

आज के नेता

       आज के नेता

ये चुनावी गीत है जी आप भी तो गाइए |
वोट हमें दीजिए और हमीं को जिताइए ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
हम तुम्हारे हमदर्द व हम तुम्हारे सिरदर्द |
दर्द की दवा तो तुम  हमीं से ले जाइए ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
रूपये ले लीजिये या कम्बल वसन लीजिये |
वोट देकर ये हिसाब जल्दी  से चुकाइए  ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
घर तो हम बनायेंगे ही सड़क भी बनायेंगे |
टोल टेक्स देकर मोटर खूब तुम चलाइये ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
सतयुग, द्वापर व् त्रेता में तो हमीं रहे |
कलयुग में अब हमसे नज़र ना चुराइए ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
सपा में भी हमीं हैं और बसपा में हमीं हैं |
  भाजपा में  हमीं  फिर जनि  सकुचाइये ||
¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯¯
तुम तो ‘आजाद’ जी हो हमरी बिरादरी के |
कुछ तो बिरादरी का फ़र्ज़ अब निभाइए ||


Saturday, April 8, 2017