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Tuesday, February 21, 2017

नेता और अभिनेता


नेता और अभिनेता

नेता अभिनेता बने ,मंचन करते रोज
        आज यहाँ तो कल वहां ,नाटक रचते रोज |
नाटक रचते रोज ,रोज की माया शातिर ,
        जनता को गुमराह करें बस वोट के खातिर |
कहता है ‘आजाद’ लोभ लालच भी देता ,
        हो  गया है  बेशर्म  आज  नेता अभिनेता ||

नहिं विकास नहिं काज कुछ पंचवर्ष का खेल ,
        इस दल से उस दल चले कर लेते हैं मेल |
कर लेते हैं मेल मात्र कुर्सी के खातिर ,
        जनता को बहकाते कह उस दल को शातिर |
कहता है ‘आजाद’ स्वार्थ के ये सरताज ,
        कुर्सी आगे दीखता नहिं विकास नहिं काज ||

किसको जनता वोट दे यह है कठिन सवाल ,
        खड़गसिंह सम है कोई तो कोई अंगुलिमाल |
कोई अंगुलिमाल बनी राह लेत है रोक ,
        कब कोई बुध आइहैं ,उनको सके जो रोक |
कहता है ‘अजाद’देश की फिकर हो जिसको ,
        चुन ले नेता भला आज यह जनता किसको ?



Friday, February 17, 2017

मौसमी बीमारी


          मौसमी बीमारी 

खादी कुरता, गाँधी टोपी ये मौसमी बीमारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


जनता से नहीं तो किससे कहूँ मन की बातें |

वोट उन्हीं के पास है सो घूमूँगा मैं दिन-रातें |

अब तो क्षेत्र में जाऊँगा क्योंकि चुनाव की बारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


नए नए वादे फिर से और नयी लुभावन सौगातें |

उनके चेहरे पहले पढूँगा और सुनूँगा उनकी बातें |

हे मतदाता राष्ट्रविधाता यह सेवक आभारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


दल बदल दिया है हमने आप के खातिर ही |

तुम भी बदलो है सही वक्त अपने खातिर ही |

हे ग्रामदेवता ,जीवनपालक विनती यही हमारी है ||

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


बहकावे में आकर भूल न जाना मुझको |

मुझ-सा नेता नहीं मिलेगा कभी भी तुमको |

अगर जीत जाता हूँ तो समझो जीत तुम्हारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


तुम भारत के भाग्य विधाता वोट तुम्हारे पास |

मुझे नहीं तो किसे चुनोगे मैं ही हूँ तो ख़ास |

भवन बनेगा सड़क बनेगा बिजली की तैयारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


सुनो सुनो हे भाई बहनों जरा ध्यान से |

कुछ नेता बातें करते हैं बड़े शान से |

हाथ उठाकर भाषण देना उनकी एक बीमारी है |

मैं नेता हूँ सच कहता हूँ मुझको कुर्सी प्यारी है ||


                       


Sunday, February 5, 2017

पाँच सौ-हज़ार

         पाँच सौ-हज़ार

सौ रूपए की नोट ने बात कही मुसकाय |
हे हजार और पाँच सौ क्यों इतना इतराय ||
क्यों इतना इतराय समय की लीला न्यारी |
गयौ  तुम्हारो  बखत आ गयौ  मेरो बारी ||
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी समय की चोट |
उसे देख खुश हो रह्यौ सौ रूपए की नोट ||
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बड़के भैय्या आ गए दो हज़ार रंग लाल |
जिनके दर्शन के लिए जनता भई बेहाल ||
जनता भई  बेहाल हाल पूछत नहिं कोई |
सुबह से लेकर शाम रात तक लाइन होई ||
कहता है ‘आजाद’ सुबह जो पहुँचत तड़के |
वही को  दर्शन  देत हमारे  भैय्या बड़के ||
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दो हज़ार की आस में दो सौ छोड्यौ साथ |
पास गयौ जब एटीएम खाली लौट्यौ हाथ ||
खाली लौट्यौ हाथ बड़ी मुश्किल भई भाई |
एक दिवस की सचमुच मजदूरी भी गँवाई ||
कहता है ‘आजाद’ कटेंगे कैसे कष्ट अपार |

कौन जुगुति से मिलिहैं नोट ये दो हजार ||





Saturday, February 4, 2017

आज के नेता

      
       आज के नेता

ये चुनावी गीत है जी आप भी तो गाइए |
वोट हमें दीजिए और हमीं को जिताइए ||
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हम तुम्हारे हमदर्द व हम तुम्हारे सिरदर्द |
दर्द की दवा तो तुम  हमीं से ले जाइए ||
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रूपये ले लीजिये या कम्बल वसन लीजिये |
वोट देकर ये हिसाब जल्दी  से चुकाइए  ||
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घर तो हम बनायेंगे ही सड़क भी बनायेंगे |
टोल टेक्स देकर मोटर खूब तुम चलाइये ||
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सतयुग, द्वापर व् त्रेता में तो हमीं रहे |
कलयुग में अब हमसे नज़र ना चुराइए ||
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सपा में भी हमीं हैं और बसपा में हमीं हैं |
  भाजपा में  हमीं  फिर जनि  सकुचाइये ||
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तुम तो ‘आजाद’ जी हो हमरी बिरादरी के |
कुछ तो बिरादरी का फ़र्ज़ अब निभाइए ||


            

Wednesday, December 14, 2016

लाइन-बे-लाइन

       लाइन-बे–लाइन
लाइन में तो हम लगे वो लाइन से दूर |
फिर भी उनके पास से नोट मिले भरपूर |
नोट मिले  भरपूर गई  नहीं भ्रष्टाचारी |
नोन भात को खाय रोवै बिटिया बेचारी |
कहता है ‘आजाद’ नोट नहीं बिनु साइन में |
लक्ष्मी वा घर चली लगे हम तो लाइन में ||
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हमको लाइन में लगा तुम घूमत परदेश |
अब तो माथा घूमता सुनि सुनिकर उपदेश |
सुनि सुनिकर उपदेश लोग अब ऊब चुके हैं|
‘मन की बात’ के सारे रस अब सूख चुके हैं |
कहता है ‘आजाद’ उदासी घेर्यौ  सबको |
राम भरोसे गयौ लगा लाइन में हमको ||
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माला जपते जो कभी लेकर तेरा नाम |
वे भी अब चुप दीखते देखो सुबहो शाम |
देखो सुबहो शाम बैंक की लम्बी लाइन |
ख़तम होत न दीखती मानो सुरसा डाइन |
कहता है ‘आजाद’ पड़ा नोटों से पाला |
वे भी भये उदास कभी जो जपते माला ||
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Tuesday, November 15, 2016

आजाद के छक्के


     आजाद के छक्के

हो गई सूनी मंडियाँ,सूना पड़ा बाज़ार |

अब कोई नहीं पूछता ,रोवै नोट हजार |

रोवै नोट हजार ,पाँच सौ चले न भाई |

हाय मेरे भगवान् कौन यह आफत आई |

कहता है ‘आजाद’ रमाये रमै न धूनी |

आम जनों की जेब हो गई ऐसी सूनी ||
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सौ रुपये की नोट का होय रहा सम्मान |
परदे बेपरदे भये जिनको था अभिमान |
जिनको था अभिमान हजारों है मेरी कीमत |
अब पूछत नहिं कोई ढेर बैंकों में दीखत |
कहता है ‘आजाद’ तिजोरी लाग्यो चोट |
हर कोई ढूँढत फिरै सौ रुपये की नोट ||
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सभी रुपये जा बसे अब तो बैंक के पास |
अब कब हाथ में आइहैं हर कोई की आस |
हर कोई की आस मिलहिं जाने कब पैसा |
ना जाने कब होइहैं चैन पहले के जैसा |
कहता है ‘आजाद’ नदारद हो गए रुपये |
सचमुच में सपने सम हो गए सभी रुपये ||
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