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Thursday, October 20, 2016

हे भारत के शेरे वीर


हे भारत के शेरे वीर


जंग लग गए अस्त्र-शस्त्र में,
         मंद पड़ गयी क्या शमसीर |
कब तक मौन रहोगे प्रहरी,
         भारत अब हो रहा अधीर ||

जुल्मिस्तान के जुल्म सहोगे,
और रखोगे कब तक धीर |
गर्व चूर कर दो अब उसका ,
हे भारत के शेरे वीर ||

ना जाने इतराय रहा क्यूँ ,
फुदक रहा मेढक के जैसे
अब तो सबक सिखाना होगा ,
ऐसे वैसे चाहे जैसे ||

कायरता से बाज न आता ,
छिप-छिपकर वह शोर मचाता|
मगर सामने आने से वह ,
गीदड़ सम छिपता कतराता ||

उसे दिखा दो उसकी सूरत ,
ऐ भारत के सिंह सपूत |
कभी न फिर पीछे मुड देखे ,
वह कायर और जुल्मी धूर्त ||
         |||||||

कवि एवं साहित्यकार- रामचंदर 'आजाद'
मो. 9414750971

Monday, October 17, 2016

सरहद के सैनिक

                                        
                  सरहद के सैनिक 
                      कवित्त-1.
सीमा पे जवान लड़ें खोलि सीना तान लड़ें ,
              देश स्वाभिमान कम होना नहीं चाहिए |
नेता जी हमारे जो जवान वीरगति पाते ,
             उनके परिवार का धियान होना चाहिए ||

नारी भयी विधवा अनाथ शिशु भये सभी ,
              उनकी देखरेख का विधान होना चाहिए |
कहत 'आजाद' वो तो प्राण तजे देश हित ,
             नेता जी तुम्हें भी सावधान होना चाहिए ||

                       कवित्त-2.

उनकी कुर्बानी व्यर्थ तनिक न जाने देंगे ,
                 ऐसा कह के और उपहास मत कीजिए |
जो गया वो अब कभी वापस न आएगा जी ,
                  भाषण सुनाय परिहास मत कीजिए ||

अब हीं चुनाव का माहौल भी न आया है जी ,
                  इसको भुनाने का प्रयास मत कीजिए |
कहत 'आजाद' कुर्सी चाहो जो सलामत तो,
                 सैनिकों को हाथ खोलने का हक़ दीजिए||

                         कवित्त-3.

सरहद चीखती है रोज नव रूप लिए,
                    भारतीय शेरों को दहाड़ने तो दीजिए |
गीदड़ों की धमकी तो सुनि रहे रोज रोज ,
                   सिंह शावकों को अब हुंकारने  तो दीजिए ||

शत्रुओं की क्या मजाल जब संग महाकाल ,
                  हिमिगिरि अगनि दहकने तो दीजिए |
कहत 'आजाद' मन उठ्यो विकराल ज्वाल ,
                  नेता जी उसे ज़रा भभकने तो दीजिए ||





Monday, September 5, 2016

मैं शिक्षक मोको पढनो भावै |




मैं शिक्षक मोको पढनो भावै |
पुस्तक ,कापी संगी साथी , लिखि-लिखि कलम  बतावै |
ज्ञान मेरो है पूंजी संपत्ति, खर्चहिं से बढ़ि जावै |
बालक संग बालक बनना  तो मेरे मन को भावै |
जाति-पाँति और भेदभाव मेरो मन को नाहिं सुहावै |

अपने ज्ञान दीप के बल पर, काम  करब मोहिं भावै|
बाल मनन में व्याप्त अँधेरा ,फिर घर नहिं कर पावै |
कुम्भकार सम मोहिं 'आजाद' भी रचना करन सुहावै ||


   कवि एवं साहित्यकार &रामचंदर आजाद
   मो- 9414750971