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Wednesday, August 31, 2016
Tuesday, August 30, 2016
Friday, July 1, 2016
Thursday, June 30, 2016
दर्द अपने चाहते हो
गीत
दर्द अपने चाहते हो यदि छिपाना |
सबसे पहले सीखिए तुम मुस्कराना ||
हो गया है तो ये चेहरा पुराना ||
आपने अपने को न जाना न समझा |
बस यही कहते रहते दुश्मन ज़माना ||
दर्द आँखों में तुम्हारे दिख रहा
है |
और करते आप हँसने का बहाना ||
ज़िन्दगी तन्हाँ नहीं कट पाएगी |
दोस्त तुमको तो पड़ेगा ही बनाना ||
चाहते ‘आजाद’ तुम गम को भगाना |
गीत कोई सीखिए तुम गुनगुनाना ||
कवि एवं साहित्यकार– राम चंदर ‘आजाद’
दूरभाष-
९९८२३९५६५३
Monday, June 27, 2016
कवित्त- बरसा
बरसा ऋतु
बादल गरज रहे मगन गगन बीच ,
देखि-देखि धरती के उर हुलसाई है |
काले, भूरे, श्वेत रंग सोहत है जाके अंग ,
चहुँ दिश शीतल पवन पुरवाई है |
कहत 'आजाद' मोर शोर वन करि रहे,
मानो बरसा की आहट कानन सुनाई है |
उर में उमंग लिए छवि को निरखती है ,
देखि-देखि धरती के उर हुलसाई है |
काले, भूरे, श्वेत रंग सोहत है जाके अंग ,
चहुँ दिश शीतल पवन पुरवाई है |
कहत 'आजाद' मोर शोर वन करि रहे,
मानो बरसा की आहट कानन सुनाई है |
उर में उमंग लिए छवि को निरखती है ,
साजन मिलन की सुहानी ऋतु आई है ||
जल की फुहारें टिप टिप कर भूमि गिरे।
धरती वसन हरे पहन सुहाई है।
दादुर तड़ाग तट टर्र टर्र करि रहे।
झींगुरों ने झन झन की राग अलपाई है।
कहत अज़ाद धान रोपि रहे नर नारी,
गीत गाती सबन के मन हुलसाई है।
हँसती हँसाती काम करती है मिलि मिलि।
मानो उनको धरती से प्रीति हो आई है।।
कवि एवं साहित्यकार&राम चंदर आजाद
Friday, June 24, 2016
Wednesday, May 4, 2016
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