वह जानती थी कि मैं एक स्त्री हूं।
वही जो पुरषों की दासी है।
सीता के मन में ऐसे
विचार का आना सहज था।
उसे अनुभव हो चुका था।
उसे याद थे वे पल जब वह
किसी की पत्नी बनी थी।
मातृत्व व पितृत्व की खुशियों
पर लग चुके पूर्ण विराम की
अब तो वह किसी की अर्धांगिनी थी।
वही अर्धांगिनी जिसे पति जब चाहे
अलग कर दे, अपने से परे कर दे।
राम ने भी तो यही किया था
उसके साथ, जिस पर उसे अपने से
अधिक विश्वास था और होना भी चाहिए
क्योंकि वह जो अर्धांगिनी थी।
लेकिन यह क्या कुछ असामाजिक तत्वों
के फेर में उसे उसके अर्धांग द्वारा
सुना दिया गया अटल सत्य पुरूषीय
फ़रमान वन गमन का।
अब भी उसे विश्वास था मैं जब
उनके वन गमन के समय साथ थी।
तो वे भी अवश्य रहेंगे।
लेकिन यह क्या इस दशा में
जब मै मां बनने वाली हूं असहाय
छोड़ दी गयी किसके भरोसे
क्या यही पतिधर्म होता है?
सीता अवाक थी अश्रुधाराएं ही बस
अब उसके साथ थीं।
पुरुष इतना कठोर होता है
आज के हिसाब से तो स्त्री आत्महत्या
कर लेती, लेकिन सीता ऐसा नहीं करेगी
प्रतिकार लेगी, कभी भी उनका स्पर्श
नहीं करेगी न करने देगी।
आज की सीता तो जनक के
घर चली जाती, उनको आपबीती
सुनाती, लेकिन उस सीता का
संबल कौन बनता, आखिर वो भी
तो राजा ही थे, वे उसे दान कर चुके थे
उस पर केवल और केवल बस राम
का अधिकार था।
शायद यही सोच वह मिथिला नरेश
के पास नहीं गयी होगी।
अब उसे रावण का अट्टहास नहीं
राम की मधुर मुस्कान व्यथित
कर रही थी ।
एक गलत होकर भी सही तथा
एक सही होकर भी गलत लग रहा था।
लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारूंगी
पुरुषत्व को एक सत्य स्त्रीत्व के
सम्मुख झुकना होगा।
चाहे वो राम हो या रावण।
उसने संतोष की सांस ली
लक्ष्य अब उसके सामने था।
उसने यही नहीं अपने पुत्रों को
कभी भी राम के बारे में यह नहीं
बताया कि राम ही उनके पिता हैं
कदाचित सीता को कहीं अपने पुत्रों से
भी दूर न हो जाना पड़े।
उसने -
अपने पुत्रों के माध्यम से पराजित
कर दिया राम की सेना को, स्वयं
राम को भी आना पड़ा
उन बालको के शौर्य को सुनकर।
प्रतिकार की भावना मन में लिए हुए।
परिचय जानकर जब
राम ने फिर से सीता को
अपनाना चाहा, सीता ने सोचा -
अब वह फिर से रामदासी नहीं बनेगी
परंतु
एक राजा कुछ भी कर सकता है
स्त्री तो अबला होती ही है।
अतः कोई विकल्प न
देखकर वह धरती में समा गई।
राम देखते रह गए क्योंकि पुरुषोत्तम
का पौरुष हार चुका था।

