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Thursday, October 17, 2019

वह जानती थी कि ....

वह जानती थी कि मैं एक स्त्री हूं।
वही जो पुरषों की दासी है।
सीता के मन में ऐसे 
विचार का आना सहज था।
उसे अनुभव हो चुका था।

उसे याद थे वे पल जब वह
किसी की पत्नी बनी थी।
मातृत्व व पितृत्व की खुशियों
पर लग चुके पूर्ण विराम की
अब तो वह किसी की अर्धांगिनी थी।

वही अर्धांगिनी जिसे पति जब चाहे
अलग कर दे, अपने से परे कर दे।
राम ने भी तो यही किया था
उसके साथ, जिस पर उसे अपने से
अधिक विश्वास था और होना भी चाहिए
क्योंकि वह जो अर्धांगिनी थी।

लेकिन यह क्या कुछ असामाजिक तत्वों
के फेर में उसे उसके अर्धांग द्वारा
सुना दिया गया अटल सत्य पुरूषीय 
फ़रमान वन गमन का।
अब भी उसे विश्वास था मैं जब
उनके वन गमन के समय साथ थी।
तो वे भी अवश्य रहेंगे।

लेकिन यह क्या इस दशा में 
जब मै मां बनने वाली हूं असहाय 
छोड़ दी गयी किसके भरोसे
क्या यही पतिधर्म होता है?
सीता अवाक थी अश्रुधाराएं ही बस
अब उसके साथ थीं।

पुरुष इतना कठोर होता है
आज के हिसाब से तो स्त्री आत्महत्या 
कर लेती, लेकिन सीता ऐसा नहीं करेगी
प्रतिकार लेगी, कभी भी उनका स्पर्श
नहीं करेगी न करने देगी।

आज की सीता तो जनक के 
घर चली जाती, उनको आपबीती 
सुनाती, लेकिन उस सीता का 
संबल कौन बनता, आखिर वो भी
तो राजा ही थे, वे उसे दान कर चुके थे
उस पर केवल और केवल बस राम
का अधिकार था।

शायद यही सोच वह मिथिला नरेश
के पास नहीं गयी होगी।
अब उसे रावण का अट्टहास नहीं
राम की मधुर मुस्कान व्यथित 
कर रही थी ।
एक गलत होकर भी सही तथा
एक सही होकर भी गलत लग रहा था।

लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारूंगी
पुरुषत्व को एक सत्य स्त्रीत्व के
सम्मुख झुकना होगा।
चाहे वो राम हो या रावण।
उसने संतोष की सांस ली
लक्ष्य अब उसके सामने था।

उसने यही नहीं अपने पुत्रों को 
कभी भी राम के बारे में यह नहीं
बताया कि राम ही उनके पिता हैं
कदाचित सीता को कहीं अपने पुत्रों से
भी दूर न हो जाना पड़े।

उसने -
अपने पुत्रों के माध्यम से पराजित 
कर दिया राम की सेना को, स्वयं
राम को भी आना पड़ा
उन बालको के शौर्य को सुनकर।
प्रतिकार की भावना मन में लिए हुए।

परिचय जानकर जब 
राम ने फिर से सीता को
अपनाना चाहा, सीता ने सोचा -
अब वह फिर से रामदासी नहीं बनेगी
परंतु
एक राजा कुछ भी कर सकता है
स्त्री तो अबला होती ही है।
अतः कोई विकल्प न
देखकर  वह धरती में समा गई। 
राम देखते रह गए क्योंकि पुरुषोत्तम
का पौरुष हार चुका था।
 



Friday, November 9, 2018

नेता और चुनाव


                 

                             कवित्त -1

नेता जी के हाथ जोरि वोट मागने पर प्यारे,

               सच कहता हूँ भरोसा मत कीजिए |

बखत चुनाव का है घूमि रहे घर -घर,

              समझ बूझि प्यारे मत अपना दीजिए |

ये चुनावी रण है अनेक रणबाकुरे हैं,

                सबकी हुँकार व पुकार सुन लीजिये |

कहत ''आजाद'' रोज बदलत पार्टी ये,

             आप भी बदलने का पाठ इनसे सीखिए ||

                         

Monday, November 5, 2018

कुर्सी के खातिर

फिर आ गया चुनाव देखिये 
               गली गली की बात देखिये |
जनता को फुसलाने खातिर 
                नेता जी  के राग देखिये ||
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Saturday, September 22, 2018

Monday, September 17, 2018

प्रकृति का संतुलन

प्रकृति का संतुलन

भगवान करे कि
केरल जैसी बाढ़ सब जगह आए ।
जिससे हर मानव को
मानवता की समझ आ जाए।।
नहीं दिखे कोई हिन्दू, मुस्लिम
ना ही सिक्ख , ईसाई।
जाति, धर्म से ऊपर उठकर
सब लगे जैसे भाई भाई।।
मंदिर में नमाज अदा हुई
मस्ज़िद में बंटा लंगर।
हाथ बढ़ा गिरजा, गुरुद्वारे 
सेवा में थे तत्पर।।
साथ लगी थी सबकी पंगत
संग संग खाते बतियाते।
भेदभाव की ढह गई दीवारें
ढाढस इक दूजे को दिलाते।।
ऊंच नीच सब एक समान।
ढह गए बड़े बड़े अरमान।।
ऊंच नीच सब गिरे मकान।
नष्ट भए सबके अभिमान।।
प्रकृति की लीला अद्भुत है।
वह संतुलन बना लेती है ।
मानव के अतिक्रमण का वह
सदा हिसाब लगा लेती है।।
प्रकृति का दोहन मत करिए।
कदर कीजिए मेरे भाई।
जाति धर्म से ऊपर उठकर


मानवता हित करो लड़ाई।।
कवि- रामचंदर आज़ाद

Saturday, September 15, 2018

जीवन इक यात्रा है

जीवन इक यात्रा है।  बस चलते ही जाना है।।
जो भी आज यहां पर हैं उन्हें कल कहीं जाना है।।

कुछ सपने टूटेंगे, कुछ रिश्ते टूटेंगे।
कुछ हमसे रूठेंगे, कुछ से हम रूठेंगे।।
कुछ सपने रिश्तों को संग में लिए जाना है।।

जीवन में आशा संग, थोड़ी सी निराशा है।
आशा  व  निराशा ही जीवन परिभाषा है।।
आशा व निराशा को कुछ रंग से सजाना है।।

जीवन की यात्रा में जब कोई नया आए।
तब नए पुराने में मन उलझ के रह जाए।।
फिर  नए पुरानों में इक रिश्ता बनाना है।।

 कवि एवम् साहित्यकार- रमचंदर आज़ाद

ओ मेरे मन

ओ!मेरे मन । ओ,! मेरे मन ।
मेरे संग संग चलाकर । कभी तू।।.......
दूर निकल जाता जब मुझसे मै घबरा जाता हूं।
सच कहता हूं तेरे बिना नहीं चैन से रह पाता हूं।।
याद सताए लौट के आजा  भुला दे अब अनबन ।।.....
सचमुच  तेरे जिद के  आगे मै बेबस हो जाता हूं।
लाख चाहकर भी मैं तुझे कुछ कह नहीं पाता हूं।।
छोड़ दे जिद अब पास में आजा मैं हो रहा अनमन।।.....
भले भुला दे मुझको पर मैं तुझको भूल नहीं पाता हूं। 
तेरी  छवि  अंतरतर में  लिए रात  को सो  जाता हूं।।
भोर भए पर तुम्हे  खोजता कर कर लाख जतन।।.....
हे मन ! मेरे बावले इतना क्यों मुझको तड़पाता है।
तू आज़ाद बनकर घूमे मुझे तनिक नहीं भाता है।।
आ मेरे संग कुछ बातें कर ले बिता ले कुछ कुछ छन।।......
कवि-राम चन्दर आज़ाद