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कवित्त- मित्रता
कवित्त
अपनी महानता का ढोल
पीटते हों काहें,
औरों की महानता की क़द्र
करि लीजिये |
अधिक चालाक जनि बनहू
हमारे मीत,
थोड़ी सी मिताई का लिहाज़
करि लीजिये |
कहत ‘आजाद’ मीत संग न
कपट सोहै,
अपनी कुचाल को संभाल
रखि लीजिये |
अपनी हिताई हल करने के
फेर में तू ,
मीत मित्रता का बलिदान
जनि कीजिये ||
कवि एवं साहित्यकार – रामचंदर
‘आजाद’
ज.न.वि.पचपहाड़ ,झालावाड़
(राज.)
मो. 9982395653
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